Wednesday, November 19, 2008

मनोहर

मेरे क्लास का सबसे तेज लड़का, जो मेरे दोस्तों में से एक नहीं होते हुए भी मुझे काफी पसन्द था, मनोहर आज जाने कहाँ है. मेरी नजर में वह एक ऐसा लड़का था जिसमें टौम स्वेयर और हकल्बरी फिन, दोनो की विशेशतायें मिल जा सकती हैं. अगर मैं उसकी तुलना अपने आप से करूँ तो समानता ढूँढने पर ही मिलेगा. वह मेरे क्लास का सबसे चमकनेवाला सितारा था जो पढाई में अव्वल आने के साथ साथ किशोरावस्था के तमाम बहकते कदमों में महारत हासिल करने के कारण जाना जाता था. पहली बात कि वह अपने नाम के अनुकूल मनोहर दिखता था. चेहरे पर मुस्कुराहट खिली रहती. उसके निचले ओठ के पास जो एक बड़ा सा तिल था, वह उसके शरारती मुस्कुराहट को और भी उजागर कर देता. उसे देखकर कोई यह अन्दाजा नहीं लगा सकता था कि वह क्लास में अव्वल आने वाला लड़का है. पढाई करने की गम्भीरता जैसी बात उसमें दिखती नहीं थी. पढाई के अलावे अन्य क्रिया-कलापों में रुचि लेने की जहाँ तक बात है तो वह सिगरेट से लेकर लड़कियों, और उससे जुड़े तमाम लफड़ों से सहज जुड़ाव रखता था. मैं इन सब बातों से दूर एक गम्भीर किस्म का लड़का था जो अपने स्वच्छतापूर्ण गाम्भीर्य के कारण अपने मित्रों द्वार दिये गये मजाकिये विशेषणों से विभूषित हुआ करता. मनोहर खेल-कूद में भी काफी रुचि लेता, जहाँ मैं एक दर्शक की भूमिका से कभी आगे नहीं बढ पाया. मनोहर मुझसे काफी आगे रहा करता जहाँ मेरी उससे प्रतिद्वन्दिता का कोई प्रश्न नही था; शायद इसीलिये मैं उसे काफी पसन्द करता था. उसने जो एक दूरी मुझसे बनाकर रक्खा, उस दूरी से मैंनें उसे बहुत प्यार किया; इसीलिये दिल आज बार-बार पूछता है कि वह कहाँ है?

सातवें क्लास तक मैं विलियम्स हाइ स्कूल मे पढा. इसके बाद यहाँ की कुछ व्यवहारिक परेशानीयों और तिलकधारी हाइ स्कूल में अच्छी पढाई की चर्चा के कारण इस नये स्कूल में आ गया. यहाँ पढाई का माहौल सचमुच विलियम्स स्कूल से काफी अच्छा था. मनोहर क्लास का अव्वल लड़का था, दूसरे तीसरे नम्बर पर जयराम और रंजीत थे. रंजीत से मेरी बड़ी गहरी दोस्ती हो गयी. खैर, नये जगह पर पड़ाई का अनुभव कफी अच्छा थ. सबसे अगले बेंच पर बैठने का रुतबा(!) नहीं होने के बावजूद रंजीत और कुछ अन्य लड़कों की सहायता से आगे बैठने का जुगार हो जाता था. कुछ दिनों में मैनें अपनी एक अलग पहचान बनाने में सफल रहा. क्लास के टीचर मुझे बड़े कायदे कानून और उच्च संस्कारों वाला छात्र मानने लगे थे. शहर में पापा की सम्मानपूर्ण हैसियत का लाभ मुझे मिलने लगा. मनोहर, जयराम, रंजीत और बाल्कृष्ण जैसे लड़कों में मेरी पूछ धीरे धीरे बढने के पीछे क्लास मे मेरे जवाब देने की क्षमता एक कारण था. फिर भी मैं परीक्षा में कोई विशेष हैसियत नहीं बना पाता. रिजल्ट आने पर वही लड़के हर बार फतेहयाब होते. वास्तव में मैं कभी उनके साथ प्रतिद्वन्दिता में पड़ना ही नहीं चाहता था. क्यों? शायद इसलिये कि पापा ने बार बार अच्छी पढाई पर जोड़ डालने की बात करते, न कि परीक्षा में सिर्फ अच्छे नम्बर लाने कि. और शायद, ऐसा भी हो सकता है कि प्राथमिक पढाई गाँव मे करने के कारण जो एक हीनताबोध रहा, उसके कारण क्लास के अव्वल लड़कों को पछाड़्ने की इच्छाशक्ति ही नहीं बन पाई हो. लेकिन इतना जरूर है कि क्लास में शिक्षकों के प्रश्नों के उत्तर देने के क्रम में कभी ऐसा नहीं लगा क़ि मैं मनोहर या किसी अन्य से पीछे रहा हूँ. फिर भी मैं इतना अवश्य मानता था कि मनोहर मुझसे ज्यादा जानता है. यही बात जयराम या अन्य किसी लड़के के बारे में मैं नहीं मानता. मनोहर के प्रति मेरे मन में एक सम्मान जैसा कुछ था जिसका कभी मैंने कहीं जिक्र नहीं किया.

मनोहर का नाम जहन में आते ही एक और नाम सहज ही उभर आता है वह है ‘चन्दा’. सुपौल शहर की वो खूबसूरत लड़की जो मनोहर से दो साल जूनियर थी, उने इस लड़के पर ऐसा जादू चलाया था कि आये दिन उससे जुड़े किस्से स्कूल में सुर्खियों में फैला रहता. वास्तव में वह लड़की अपने खूबसूरती के जलवे से शहर के कई लड़कों को अपने प्रेम पाश में बान्धे हुई थी. मनोहर उन कई दीवानों में एक था. अच्छी तरह याद है वो लड़की. गोरी-गोरी साधरण कद की वो छोरी सचमुच चान्द सी खूबसूरत थी. उसकी अदाएँ जानलेवा थी. इतनी कम उम्र में ही उसने अदाओं को जिस महारती के साथ आत्मसात किया था उसे हमारे समाज में चालुपन का नाम दिया जाता है. उसकी अदाओं में चिपके दीवानों की प्रतिद्वन्दिता शहर के चटपटे कोने का एक अभिन्न अंग था. ऐसी बातों में रुचि लेने वाले बेसब्री से ‘चन्दा’ से जुड़े प्रसंगों को जानने को उत्सुक रहते. विशेशकर स्कूल में लड़के(और शायद टीचेर्स भी) ‘न्यू डेवेलपमेंट के प्रति जागरुक रहते. स्कूल पहुँचते ही च्न्दा और मनोहर से जुड़ी खबरें स्वनियुक्त सम्वाददाताओं और प्रसारकों द्वारा चहुँ ओर प्रसारित होने लगती. लड़के दो चार के गुटमें बँटे इन घटनाओं पर मजेदार अन्दाज में विश्लेषण करते नजर आते, जब तक कि क्लास टीचर आ न जाँएँ.

घटनाएं क्या होती थी, चन्दारानी के प्रतिद्वन्दियों में मुठभेरों की दास्तानें होती. इन दास्तानों में मनोहर की स्थिति मजनूं जैसी थी. वर्णन होता कि कैसे मनोहर अपने कुछ सहयोगियों के साथ चन्दारानी का पीछा किया और उनके पीछे मनोहर के राइवल लड़कों ने उन्हे कहाँ धर दबोचा. उसके प्रतिद्वन्दी उससे काफी सबल होते, नतीजतन मनोहर अक्सर ही रिसीविंग एन्ड प होता. घटनाओं में अक्सर ही मनोहर के पिटने का जिक्र होता. मसलन ‘आज मनोहर गंगा टॉकीज के पास पिट गया’ तो किसी रोज महाबीर चौक से जुरी खबर होती. इसमें विशेश यही हो सकता था की कल मनोहर के पापा ने उसकी जमकर धुलाई की. वास्तव में मनोहर के पिता काफी कड़े स्वभाव के थे. वह मनोहर की पढाई के प्रति बड़ा सख्त रुख रखते थे. मनोहर की पढाई के बाहर लफ्फासोटिंग जैसे एक्ट्रा कैरीकुलर एक्टिविटी से सख्त नफरत थी. मुझे याद है एक बार वो अपने कोर्ट कलीग्स के साथ मेरे डेरे पर पहुँचे. करीब तीन बज रहा था. मैं उस समय सोकर उठा था. अचानक ही चार –पाँच लोगों को देखकर मैं थोड़ा घबराया भी. उन लोगों ने मुझसे मनोहर के बारे में तफ्सील से पूछताछ की. वह कब स्कूल पहुँचता है, किन लड़कों के साथ रहता है, क्या कभी दोपहर में क्लास छोड़कर बाहर भी जाता है, आदि आदि. मनोहर के पापा पीची की तरफ बैठे थे, उन्होंने मुझसे कुछ ज्यादा नहीं पूछा. यहाँ ध्यान देनेवाली बात यह थी कि उन लोगों ने क्लास के सभी लड़कों में सिर्फ मुझे ही इतना सच्चा समझा कि मुझसे पूछताछ की.

मनोहर के बारे में मैनें बड़े सन्यमित ढंग से उस तफ्तीसी दल को सूचनाएं दीं. मेरे मन में मनोहर के लिये जो एक प्यार था उसने मुझे उसके प्रति निर्दयी बनकर सच्चाई बताने से रोका था. वास्तव में मनोहर और चन्दारानी के रोमैंटिक प्रसंगों में लड़के( और टीचर्स भी) काफी रुचि लेते थे. ये सब स्कूल कॉलेज के स्वादहीन रुटीनस-माहौल में एक तरो-ताजगी भरा लीजर ब्रेक की तरह होता है जिसमें हर कोई किसी न किसी रूप में अपनी हिस्सेदारी निभाना चाहता है. मनोहर की पडाई पर इन सब का कैसा असर पड़ा यह एक अध्ययन का विशय हो सकता है. मैने पहले ही बताया है कि पढाई में मैं उससे कभी कोई प्रतिद्वन्दिता नहीं रक्खा. वह लगातार क्लास मे फर्स्ट आता रहा, जयराम और बाल्कृष्ण उसके पीछे दूसरे और तीसरे पायदान पर बने रहे. मैं पहले की तेरह क्लास में अपने पोजीशन से अनजान अपनी धुन में चलता रहा.

उस दिन शायद 10वीं जुलाई था. शाम को सत्कार होटल के सामने प्रीतम के साथ टहल रहा था कि किसी ने बताया कि दसवीं का रिजल्ट आ गया है. बड़ा अजीब अनुभव हुआ. रिजल्ट आ गया है! इससे पहले रिजल्ट के बारे में सुनकर कभी ऐसा अहसास नहीं हुआ था. उत्सुकता और हल्का भय आस-पास फैला हुआ लगा. जैसे तैसे शाम से रात, रात से सुबह हुई. रात ख्वाब क्या देखा, कुछ याद नहीं. खैर सुबह 10 बजे स्कूल पहुँचा. चारो तरफ शोर था, मनोहर 628 अंकों के साथ अव्वल स्थान पर बरकरार था. उसी उत्सुकता और भय जैसी कोई चीज के साथ हेडमास्टर साहब के कमरे में पहुँचा. टेबुल पर रिजल्ट शीट फैला था. हेडमास्टर साहब ने मुझसे पूछाक्या हुआ तुम्हारा रिजल्ट?’. मैने कहा अभी देखना है. रिजल्ट शीट खोलकर देखना शुरु किया. कई नामों से निगाहें गुजरते हुए अपने नाम जैसे ही किसी शब्द पर जाकर रुका. वो मेरा ही नाम था. उंगलियों के सहारे अलग अलग विशयों के मार्क्स से होता हुआ टोटल पर पहुँचा—649! अचानक विश्वास नहीं हुआ. ‘सर मेरा टोटल मार्क्स 649 है’, उन्होंने बिना मेरी तरफ देखे हि कहा ‘उसमें से एक विशय का मार्क्स काटा जायेगा”, लेकिन उससे आगे जो देखा तो लगा मेरे पाँव के नीचे रूई जैसी कोई चीज आ गये है. टोटल अग्रीगेट में मेरा मार्क्स 750 से ज्यादा था, यानी मेरे 649 एक सब्जेक्ट के एक्स्ट्रा मार्क्स को काटकर बनता था. हेडमास्टर साहेब को हठात् विश्वास नहीं हुआ, उन्होंने रिजल्ट शीट अपनी ओर खींचते हुए गौर से देखना शुरु किया. हल्की उधेरबुन के बाद कहा ‘हाँ ये तो सही है, तुम्हारा मार्क्स स्कूल मे सबसे ज्यादा है, तुम फर्स्ट आये हो’. असाधारण अनुभूति का एक ज्वार सा उठा मन में. मेरे क्लास टीचर श्री ब्रह्मदेव राय हेडमास्टर के कमरे में पहुँचे, एक-एक क़र और भी टीचर आस पास जमा हो गये. कुछ को लग रहा था जैसे रेस में किसी ब्लैक हौर्स ने बाजी मारी है तो कई ऐसे भी थे जो मान रहे थे कि यह तो एक डिजर्विंग कैंडिडेट की उपलब्धी थी. इसके बाद सारे स्कूल फिर शहर में मैं मशहूर हो उठा. मनोहर का 628 अब द्वितीय स्थान पर था.

इसके बाद मेरे प्रति मनोहर के व्यवहार में एक गुणात्मन परिवर्तन आया. वह मेरे घर भी आया. मैं उसके प्रति पहले से ही आकर्षित था, अब उसके व्यवहार ने मुझे उसके और करीब ला दिया था. इस समय तक उसके धर में और भी कई तरह की परेशानियाँ ले आयीं थीं. उसके पिता कैंसर से पीड़ित पाये गये. मनोहर अपनी पढाई अच्छी तरह नहीं चला पाया. इंजिनीयरिंग की परिक्षाओं में उसे सफलता नहीं मिल पाई. आइ. एस. सी. के बाद ही उसने एअर फोर्स में एअर-मैन की नौकरी कर ली. नौकरी में जाने के बाद उसने शायद बंगलौर से एक अंतर्देशीय पत्र मुझे लिखा था. बड़ा अपनापन था उसमें. उसके बाद कोई सम्पर्क नहीं हो पाया. उसके पिताजी का ट्रांस्फर मधेपुरा हो गया था. वहीं उनका देहावसान हुआ. उसके बाद सुना था कि उनके स्थान पर मनोहर के छोटे भाई को नौकरी मिल गयी थी. मनोहर की एक बहन जो पढने में काफी तेज थीं, उनसे भी मैं कई बार मिला था. उन सब से आज कोई सम्पर्क नहीं है, फिर भी मनोहर एक हँसते हुए चेहरे सा मानस पटल पर अंकित है.

Sunday, August 24, 2008

बदलते मानी

एक अरसे से तलाश थी किसी ऐसे वेब्साइट की जहाँ से अपनी पसन्द की गीत और गजलें सुन पाउँ. जबसे अहसासों की दुनियाँ में होश सम्भाला जादूई आवाजें मुझे घेरने लगीं. फिल्मों के गाने तो काफी पहले से ही अपना एक असर रखती थी मगर नये उम्र की देहरी पर जब गजलें, ठुमरी और ऐसी ही गहरी असर रखनेवाली चीजों के नये पैगाम मेरे कानों में पडी तो मेरे अन्दर एक रीतिकालीन सुबह का अहसास जागा. आठवीं क्लास में पहुँचने से पहले पंकज उधास की गजलों से माहौल सराबोर था, मैं भी चान्दी जैसा रंग है तेरा का मतलब समझने लगा था. ऐसी चीजों के साथ हरीओम शरण और अनुप जलोटा के भजनों का दिवाना दिल मेरा एक दिन अचानक ही गुलाम अली के चुपके-चुपके.. की महफिल के किसी कोने में दिल हार बैठा. चौदह पन्द्रह की वो दहलीजी असर काफी स्ट्रोंग था. गुलाम अली का पहला कैसेट मार्केट में आ चुका था. शुरु- शुरु में उन गजलों नें(या उनकी धुनों ने) मुझे कुछ खास प्रभावित नहीं कर सकीं. लेकिन, धीरे-धीरे गुलाम अली ने मुझे ऐसा दीवाना बनाया कि मैनें उन्हें न सिर्फ अपना सरताज बना लिया बल्कि औरों के ऐसा न करने पर कई बार गरमागरम बहस में भी खुद को उलझाया. इस समय मुझे ऐसे किसी भी शख्स से गहरी शिकायत हो सकती थी जो गुलाम अली की गायकी को किसी और गजल गायक से कमतर मानने की बात करता. पंकज उधास जैसे गजल गायकों को मैं एक प्रकार की हिकारत से देखने लगा. नये उम्र के उस पड़ाव पर भी मैं एक क्रिटिक वाली हैसीयत का दावा करने लगा. पंकज उधास या चन्दन दास की गजलों के रिकौर्ड्स खरीदना मेरी समझ में एक लो टेस्ट् जैसी चीज बन गया.

अगले दौर में, जब मैं मैट्रिक पास कर रहा था, मेहंदी हसन से मेरा साक्षातकार हुआ, और जल्द ही मेरी प्रतिबद्धता इनमें और गुलाम अली में बँट गयी. मेरे अन्दर इन दोनों की महानताओं को लेकर अक्सर ही अघोसित उठा-पटक चलने लगा. इस मुद्दे को लेकर दोस्तों से अच्छी खासी बहस हो जाती. धीरे-धीरे मेरे अन्दर का स्रोता मैच्योर होने लगा जिससे मुझे यह मानने में आसानी हुई की एक ही क्षेत्र में एक से अधिक महान हस्ति हो सकते हैं. दोनों की अपनी खास पहचान की समझ मुझमें आ गयी थी.

इसी सब के बीच जगजीत सिंह की कुछ गजलों ने मेरा ध्यान आकर्षित किया. खासकर, उनकी आवाज की मखमली इफेक्ट कमाल का लगता था. इसने मेरे मन में उनके लिये एक सम्मान का भाव जगाया, लेकिन इससे आगे कुछ और नहीं हो पाया. एक म्यूजीशियन की हैसियत से जगजीत सिंह मेरे दोनों स्थापित गजल गायकों से बड़े लगते थे मगर गायकी के खयाल से हमारे दोनों उस्तादों का जवाब नहीं था. जगजीत सिंह की कैसेट वर्षों मैं इसलिये नहीं खरीद पाया क्योंकि उनकी असाधारण आवाज के साथ उनकी पत्नी चित्रा सिंह की आवाज का चिपका होना मुझे पसन्द नहीं था. कैसेट की दुकान पर मैं उनकी ऐसी चीज तलाशता जिसमें चित्रा सिंह का योगदान न हो.

मैं अपने पसन्दीदा गायकी को सिर्फ सुनने का दीवाना नहीं था. औरों को सुनाना भी मुझे काफी पसन्द था. कभी-कभी तो मैं अपने पास वाले को इतनी तवज्जो के साथ सुनाने की कोशिश करता कि मुझे पता ही नहीं चलता कि सामनेवाले के साथ ज्यादती भी कर रहा हूँ. शुक्र ये रहा कभी किसी ने भुझे मेरी इस हरकत के लिये वैसा रिऐक्सन नहीं दिया जो एक बुरी याद बन मेरे मन में बैठ जाये. इस प्रकार मैनें गुलाम अली और मेहँदी हसन के कई पक्के चाहनेवाले बनाये. कई खूबरूवों को वो हसीन सुरों के पैमाने पेश करते हुये मैंनें अपनी छुपी हुई अहसासों को उन तक पहुँचाने में कामयाबी पायी. औरों को सुनाने में जो मजा मिलता था वो खूबसूरत यादें बन गयीं. आज भी उन गजलों गीतों को सुनने पर वो हसीन लम्हा आस-पास चलकदमी करने लगती हैं. वक़्त बीतने के साथ समझ बदलना लाजिम है. जिनके बारे बेमेयारी होने का खयाल था उन्हें फिर से सुनने की जहमत उठाया तो पाया कि जनसाधारण के बीच वाहवाही लूटनेवाले गायकों में ऐसा बहुत किछ था जिसे हम न सुनकर अच्छा नहीं कर रहे थे. पंकज उधास जैसे गायकों के बारे में अपने कुछ चाहने वालों से जब प्रशंसा सुनी तो मैने उन खूबियों की ओर ध्यान दिया जिसे हम अपने उस्तादों के मेयार के आगे देखने से ही इंकार करते थे. एक शाम जब पापा ने पंकज उधास की कभी-कभी तेरे मैखाने.... की प्रशंसा में विभोर हो गये तो मैने उस गजल को गौर से सुना और उसकी खूबसूरत गायकी का कायल हो गया. मैच्योरिटी का एक नया आयाम मेरे मन से जुड- गया. साथ ही, वो पुराने गीत जिन्हें मैं सड़क किनारे बजते सुनता था, धीरे-धीरे अच्छे लगने लगे. क्योँ?-- देर से पता चला कि उन गजलों के साथ जिन लोगों की यादें मेरे मन से जुड़ी थीं वो हमसे बिछड़ चुके थे. उन यादों में एक महत्वपूर्ण कड़ी बनकर वो गाने मन के बैकग्राउंड में बज रहे थे. यह भी था कि गम्भीर गजलें सुनते-सुनते हल्की-फुल्की सुपाच्य धुन कान को अच्छे लगने लगे थे. मेरे मन का गम्भीर स्रोता अब सहजता की तलाश में था. शास्त्रियता से अलग हटकर सहजता की तलाश एक अलग तरह की सुहानेपन का अहसास था.

वक़्त बीतता रहा, मैं इश्क़ करता रहा, गजल सुनता रहा, कहता रहा, और वक़्त सचमुच बीतता रहा. गजलों, गीतों, नग्मों के वो कैसेट्स जिन्हें खरीदते समय उससे बिछड़ने की बात जेह्न में आई ही न थी, आज कहीं दूर धूल और मकड़ी के आगोश में चुपचाप पड़ी होंगी. सोचता था किसी रोज उन्हें फिर से जगाकर उनके सुर ताल से मन को पुरानी अहसासों में रंगुँगा. ऐसे ही और भी वक़्त बीत गया. अचानक, एक दिन एक लड़के ने www.dishant.com की चर्चा की, बताया वहाँ सारी पुरानी गीतों का जखीरा उपलब्ध है. अगली नेट ब्राउजिंग पर ही मैनें इस वेब्साइट को विजिट किया. सचमुच, अद्भुत संग्रह है. मेहदी हसन, गुलाम अली, बेगम अख्तर, जगजीत सिंह के साथ साथ सभी बड़े नामों की गजलें उपलब्ध हैं. एक के बाद दूसरे तीसरे गायकों को सुनते हुए ऐसा लग रहा था कि जिन गजलों को सुनकर मन मस्ती के सागर में गोता लगाने लगता था, अब बड़ा फीका-फीका लग रहा है. शब्द वही हैं, उसके मानी भी वही, वही बेहतरीन कम्पोजीशन, फिर भी उनसे जुड़ा जादु जाने खो सा गया है. उन पूराने गजलों को अब सुनने पर वो कुँवारा फीलिंग नहीं उभर रहा. वो सारे गीत इतने उदास क्यों हो गये?

जाहिर है, इन गीतों गजलों के इर्द गीर्द जो एक माहौल था, जो लोग थे, जो हमारे साथ उन्हे सुनते हुए मेरे आनन्द को रेजोनेट करते थे, वो सब हमसे दूर हो गये हैं. माहौल बदल गया, तो इन गीतों के हमसे जुड़े मानी भी बदल गये. कोशिश करके देखा तो उन बीते लम्हों को याद करते हुए सुनने में ज्यादा सुकून मिला. ऐसा लगा कोई पास बैठकर मेरे साथ साथ सुन रहा है. बन्द आँखों में माजी के खयालों में उतराते उन गीतों को सुनना एक अलग तरह का सुकून लगा. लेकिन फिर खुली आँखों में जो आज है उसमें वे पुराने गीत बड़ी फीके लगते है.इसमें www.dishant.com का कोई कसूर नहीं, इस वेब्साईट का काम गीत और गजले उपलब्ध कराना है, न की असर तलाश करना.

Wednesday, August 6, 2008

संग्रहालय का सच

उत्तर भारत के संग्रहालयों में जो समानता मिलती है उनमें सबसे महत्वपूर्ण हैं विखंडित मूर्तियाँ का संग्रह जो बदहाली के बावजूद भी अपनी ख़ूबसूरत अतीत के बारे में बहुत कुछ कहती हैं रहीं. वो कभी किसी भव्य मन्दिर के गर्भगृह में शोभित रही होंगी; लोगों के श्रद्धा का केन्द्र रही होंगी. संग्रहालयों के अतिरिक्त ऐसी हजारों मूर्तियाँ आज भी जहाँ तहाँ छोटी-बड़ी मन्दिरों में पूजित हैं. ऐसी खंडित मूर्तियों को देखकर सहज ही मन में उठता है- क्या ख़ूबसूरत होना ही इनका गुनाह था? आस्था का आधार होना भी क्या गुनाह है? एक इंसान किसी प्रेरणा के वशीभूत पत्थरों में जान डालने की कोशिश करता, तो कोई दूसरा किसी और प्रेरणा के चलते उन्हें तोड़कर, उन्हें अपनी ठोकरों में डालकर खुश होता है. खैर! इन खंडित मूर्तियों को देखकर एक हिन्दु मन में टीस तो उठता ही है. यह गौर करने की बात है कि सारे उत्तर भारत में प्राचीन या मध्यकाल का एक भी मन्दिर अवशेश नहीं मिलता। क्यों? क्योंकि उन्हें तोड़ डाला गया. फिर से वही टीस! ----

कोई चाहे तो मन में उठनेवाले इस टीस को एक प्रतिकृया का रूप भी दे सकता है. लेकिन इस्लाम की आक्रामकता और संकीर्णता से परे नजर हटाकर देखने पर ऐसी तमाम बातें मिलती हैं जिनसे मिलकर एक सभ्यता का ताना-बाना बनता है. संग्रहालयों में खंडित मूर्तियों से नजरे हटाकर देखने पर एक पूरी संस्कृति का कैनवास मिलता है, जिसकी खूबसूरती अपने वक्त की इंसानी तहजीब का भरपूर अक्कासी करता है. इस्लाम का भारत के साथ का जुड़ाव चाहे कितना ही रक्त्रंजित या त्रासदीभरा रहा हो लेकिन वह तस्वीर का एक पहलू मात्र है. इससे अलग एक समूचा तहजीबी किताब है जो भारतीयता का ही प्रतिनिधि है. इस्लाम का भारतीयता के साथ जो सम्बन्ध विकसित हुआ वह इस देश के हिन्दु, और मुसलमान का शरीकी पूँजी जैसा है जिसे किसी प्रकार अलग नहीं किया जा सकता. सच तो यह है कि हिन्दुस्तानी तहजीब के चादर को फिरके वारियत के पागल्पन में टुकरे-टुकरे किया जा सकता है, उसके रेशों को अलग नहीं किया जा सकता. हर-एक हिन्दु में एक मुसल्मान भी है और हर एक मुसल्मान में एक हिन्दु भी है. हमारा व्यक्तित्व अक्सर ही प्लूरल होता है. निदा फाजली का आदमी आज की हकीकत है,

हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी

जिसको भी देखना हो, कई बार देखना

मुझे लगता है कि म्यूजियम में टूटी मूर्तियों को देखकर एक मुसलमान को भी अच्छा नहीं लगता, उसे भी अन्दर में कुछ टूट गया सा अहसास होता है, खूबसूरती के बिखर जाने की टीस उसके मन में भी होता है. और, क्या, हिन्दु मुर्तियाँ नहीं तोड़ते, खूबसूरती को नहीं उजारते? यह तो इंसानी फितरत है, जो सबकी हकीकत को एक ही आईने में देखने से प्रकट हो जाती है. अक्सर हम अपना चेहरा सुविधानुसार एक आईने में देखते हैं तो किसी और का चेहर किसी विकृत आईने में दिखाते हैं.

Monday, August 4, 2008

सोल्झेनित्स्यीन्

04-08-2008

रिस्ते भी अजीब अजीब होते हैं. ढूँढिये तो हर जगह निकल आयेंगे. आज की एक खबर है कि सोल्जेनित्स्यीन नहीं रहे. एक महान साहित्यकार से उसके हर चाहनेवाले का रिस्ता होता है, उन चाहनेवाले में अक्सर उसके पाठक होते हैं. उनसे मेरा ऐसा कोई रिश्ता नहीं रहा.मैनें उनकी कोई रचना पढी नहीं. हाँ, उनके बारे में सुना जरूर है, कुछ को देखा भी है. पापा की लायब्रेरी में उनकी कैसर वार्ड से मेरा नज्दीकी ताल्लुकात रहा है. गहरे नारंगी रंग की पेपरबैक संसकरण की यह किताब पापा के टेबुल पर कई महीनों तक शोभित रहा. यह किताब मेरे रोज की आमदनी का स्रोत था. पापा मेरे लिये इसी किताब के पन्नों के बीच रुपये रखकर कहीं जाया करते. मैं कहीं से आता या पढाई कर उठता तो होटल की तरफ मुखातिब होने से पहले कैंस्र वार्ड के पन्नों के बीच रुपयों के लिये टटोला करता. इस किताब ने मुझे शायद ही कभी निराश किया हो. मिड्ल स्कूल के उन प्रारम्भिक दिनों में मैं इस किताब को जब भी देखता एक विश्वाशपूर्ण खुशी मिलती. इस के पन्नों के बीच से मेरे लिये पेट-पूजा का जुगार भी होता था तो इसी की बदौलत चम्पक,पराग, नन्दन जैसी पत्रिकाओं के अलावे उन कौमिक्सों का भी लुत्फ मिलता जो मैं पापा से छुपाकर ही पढता था. इस किताब के पहले पन्ने पर पापा के अंतरंग मित्रों में एक नागेश्वर पाठक का आंग्रेजी में किया गया हस्ताक्षर था जो निश्चय ही उसके मालिकाना हक को दर्शाती थी. हालाँकी मुझे यह पता था कि कैंसर वार्ड को सोल्जेनित्स्यीन ने लिखा है. बाद में जाना कि इस महान लेखक ने और भी कई कृतियाँ लिखीं जो उसके संघर्षपूर्ण जीवन की हकीकतों, खूबसूरत अहसासों, खयालों की अक्कासी करता है. उनकी किताबों के नाम सामान्य-ज्ञान बढाने की दृष्टि से याद रखना भी जरूरी था. अफसोस कि उन किताबों में से किसी एक को भी पढने की हिम्मत नहीं जुटा पाया. अगर पढा होता तो उनके बारे में, उनसे मेरे रिश्ते के बारे में कुछ कहनें में संकोच महसूस नहीं होता. उनके नहीं होने की खबर से जो एक खालिपन सा लगा वह अनायास हे मुझे पच्चीस साल पहले खींच ले गया जहाँ पहुँच्कर, ऐसा लगता है, पापा की वो टेबुल खाली पड़ी है, शायद, उस कैंसर वार्ड को उसके मालिक वापस ले गये!

Monday, March 24, 2008

इशमेला की होली

फगुआ फाग खेलन को जनकपुर आयहु राज दुलार
फगुआ फा----
आयहु राज दुलार हो
आहो आयहु राज दुलार
फगुआ फाग खे---
कोयल कुहुके पपिहा पिहके देख बसंत बहारा
गृह-गृह युवति होली खेले कंचन कलश हजार
फगुआ फाग खे-----
धौंसा धमके तबला ठनके, राजा जनक जी के द्वारा
रंगमहल मिथिलेशकिशोरीसंग लिये सखियाँ हजार
फगुआ फाग खेलन को जनकपुर आयहु राजदुलार
जनक दुलारी अबिर लिये झोरी, केसर राजदुलारा
मचेउ धराधर रंगमहल में, शोभा अगम अपार
फगुआ फाग-----
रामजी रंग सिया पर छिड़के, सखियाँ देत ललकारा
नन्द कुमार अबिर अभरख से, भर गये शहर बजार
फगुआ फाग-----

रचयिता- स्वर्गीय नन्दकुमार त्रिपाठी


होरी रंग से भरी राजा दसरथ के दरबार
होरी रंग-----
दसरथ के दरबार हो
आहो दसरथ के दरबार
होरी रंग----
सरयू तीर अयोध्या नगरी, कंचन जड़त केवारा
मणि माणिक के खम्भ जड़त है, कुन्डी जरत हजार
होरी रंग से-----
बेला चमेली चहु दिशी गमके, केवरा इतर गुलाबा
रतन सिन्हासन राजित राजा दशरथ, केसर के फुहुकार
होरी------
विश्वामित्र वशिस्ठ जी के चेले, दसरथ जनक दुलारा
रनिवासन से चले पिचकारी, मानौ गंगाजी के धार
होरी रंग-----
लाल गुलाल लाल भये बादर, लाल भये गुरुद्वारा
नन्द कुमार लाल भये राजा, लाल भये सुत चार
होरी रंग से ------
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आज सखी सैयाँ आवत होइहैं, बाँये नयन फड़के
आज सखी----
बायें नयन फड़के कि हो
आहो बाँये नयन फड़के आज सखी सैयाँ-----
उड़ि-उड़ि कागा पलंग चढी बइठे, बोलिया बोलत सगुन के2
चहूँ ओर झाल झमाझम बाजै, चोलिया के बन्द सरकै
आज सखी----
आहो बाँये नयन फड़के---2
आज सखी सै----
अचरा फड़कै पुपुनी फड़कै, रही रही जियरा धड़कै2
चढल जवानी उमरिया कि थोड़ी, पतरी कमर लचकै
आज सखी---
आहो बाँये नयन----2
आज सखी----
सूतल रहलि सपन एक देखनी,पिया संग सोवै लिपट के
औचक आये जगाये दियो हैं, सास ननद धर के
आज सखी----
अबिर गुलाल कुंकुमा केसर, घर घर अभरख झलकै
नन्द कुवँर पिय आये गयो हैं, तिरछी मुकुट धरकै
आज सखी----



इशमेला की होली

 होली गीत
काशी धूम मचे आज पशुपति खेलत फाग
काशी---------
पशुपति खेलत फाग हो
आहो पशुपति खेलत फाग
काशी धूम --------
शंकर के कर डमरू बिराजै, भुत-बैताल लिये झाला
नाच कूद के होली गावे, पहिरे गले मुंड माल
काशी धूम----
साँची मगही गुलाबी बीड़ा, कंचन थाल मशाला
इतसे शंकर भांग धतूरा, चन्द्र विराजत भाल
काशी धूम ------
हीरा जड़ित कनक पिचकारी, नौ मन उड़त गुलाला
भर पिचकारी गौरा जी पर मारे, गौरा हो गयी लाल
काशी धूम मचै--------
भैरो के सिर पाग रंगाये, कुसुम रंगाये बैताला
नन्द कुँवर सिर सोहे गौरा के, शंकर के मृग छाल
काशी धूम----

--रचयिता स्वर्गीय नन्द कुमार त्रिपाठी
ग्राम - - इशमेला , सारण , बिहार


Thursday, February 14, 2008

परबत ऊपर बोयेलो लौयेंगिया
छछन बीछन भइले डाढ


घामले घुमले अयेलन अनजानो दुलहा
तोड़ले लौयेंगिया के र डाढ


दुअरे बइठल रउरा बाबु अनजा बाबु
मालिन ओलहनवा लेले ठाढ


बरजू अनजानो बाबू अपनी दूलरुआ
तुड़ले लवंगिया के र डाढ


बालक रहतो गे मालिन बरजल जइतो
छैला बरजलो न जाए


प्रस्तुति- मृदुला सिन्हा
आहत स्वाभिमान

चिलचिलाती धूप में भी
उड़ती रही चिड़िया
आकाश में दिन भर
बादल का एक टुकड़ा
चलता रहा उसके सिर पर
लगातार
भूल गई है दुपट्टा आज जल्दी में


छाँह में
अलसाए गिद्ध ने रोककर उसे
भर लिया अपने अंक में जबरिया


आहत स्वाभिमान
बसों-ट्रकों के नीचे दब-कुचल रही है
उसके लहू से अभिसिंचित आकाश
तेजी से बदल रहा है रंग
दिशा बदलकर फिर
भागने लगा है शहर

कचरे में बचपन ढूँढते बच्चे
आज फिर हुए निराश

एक तेज शरगोशी
दौड़ रही है कानों-कान
कल फिर छपेगा अखबार
-पुश्पेन्द्र फाल्गुन, नागपुर

Wednesday, February 13, 2008

वो भी

सामने

निगाहों के सामने
होता है कभी
कोई झुरमुट हरा-भरा
कभी दीवार कॉंक्रीट का खड़ा
जिसके पास है शहर
जिसमें बसते हैं बशर
नालों के किनारे--

निगाहों के सामने
कभी कोई सिलसिला
हरी वादियों का,
कभी सहरा
बेआबादियों का
और ऐसे ही कभी
होता है है निगाहों में
तिलिस्मों की बेहुदूद जमीन
जिससे मिलता है उफक
इन्द्रधनुसी रंगें बिखेरकर

वहीं रहती हो तुम
हक़ीक़तों से दूर दूर
और हम हैं यहाँ
बस यूँ ही मजबूर!
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वो भी

बरसात में भीगे नये पत्तों से
टपकते बूँदों को
मन की जमीन पर
महसूसता हूँ
बन्द आँखों में
शायद, याद आ गयी हो तुम---



क्या हुआ था ?
फटे पन्ने
किताबों के
उड़ रहे है
गिर्दो-पेश मेरे,
तुम चली गयी हो कहीं
ख़फा होकर--



सामने कैनवास पर
लहराती है लकीर
तुम्हारे बदन की ढलान सी,
कामिनी के फूल
खिल रहे हैं कहीं,



उफ्फ!
ये नटखट मेरे मन का किशोर
भटकाता है मुझे
सरगोशियों में
बीते हसीन वादियों में---
--नमितांशु

Thursday, February 7, 2008

gahre nisshabda raatri mein

lamhon ke karwein ruk jaate hain jab

thithurte patton ke aas paas,

karahata hai koii ukhre-ukhre sanson mein

mere paas, mere rooh ke girdo-pesh,

gunagunaataa hoon main bewajah

shivranjani ke suron ko,

aisa lagta hai jagti ho tum

door kahin,

chawnkkar khwabon se

bhatakte suron ke dastak pe

gahan nisshabd ratri mein।



फिर, gaataa hoon main jhoomkar

drut shivranjani

apne ansuon ko choomkar

tumko sunane ko, ya

khud ko बहलाने को



gaamjan hain phir se

lamhon ke kaarwen

ek subah ki ore--





namit, 19.01.03

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kya sundar chehra kavita hai?

haan! sundar chehra kavita hai

kyon?

kyonki maine dekha indradhanush ko

faila apne maanas tal par

aabhaa uske sundar mukh ka,

thithure thande paani se jab

dhota tha main kapre apne,

subah subah thi jare ki tab!



18.01.03

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tere bahane basi thijo ek basti

weeran ho rahi ujar rahi hai

purane koliyari ki mallika

ho rahi hai jamin yahan ki sasti

masti bhi kho rahi hai is jahan ki

sanwlapan utawlapan tera

panakta tha dekhkar mera bankpan

kshitij par lautti hai wo kashti



17.03.04

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॥कला-साधना॥

अन्धेरी घाटियों की

भूल-भुलैया में

मौत के भयंकर अज्दहों से

पंजा लड़ाता रहा

अकेला मैं

रक्त से लथपथ

हो गये मेरे हाथ-पाँव

थकता गया, हारता गया

रक्त के सैलाब में बहता गया मैं

लेकिन मेरी आँखें

सुदूर आकाश के

श्वेत-पुष्पों पर टंगी थीं

मौत की स्याह चादर में

ममता ढूँढता रहा माँ की

सौन्दर्य-किरणों के

कोमल-स्पर्श की

कामना करता रहा

आग के दरिया में

बहता रहा

लेकिन आँखें

किनारे पर खिले गुलाबों पर

टिकी रहीं

कई बार

मौत की बाँहे

खींच ले गयीं

अपनी गोद में

लेकिन मेरी आँखें

जीवन की कमनीय सौन्दर्य की

मोहकता आँकती रही

मुझे पुकारती रही मौत

और उसी की गोद में

दुबका मैं

जीवन तराशता रहा

यह रहस्यमय खेल

चलता रहा

मैं धीरे-धीरे गलता रहा

बर्फ सा

मौत की धीमी आँच में

हारता रहा मैं

लेकिन हार नहीं मानी

मरता रहा पर

मौत नहीं जानी

मीठी जहर-सी मौत

मुझे बहुत प्यार करती है

और, मुझे इससे नफरत है

इसी नफरत की आग में

प्रेम के उजले फूल

उगाता हूँ

मृत्यु की गोद में

जीवन के गीत गाता हूँ

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॥आत्मन॥

मत घेरो हमें

प्रवंचना की दीवारों से

प्रलोभन की लकीरों से

मत घेरो

शास्वत सत्य अपने

बन्द करो बक्सों में

और हमें जीने दो

जब कभी

सन्धि के दो क्षण

हमें नसीब हुए

छीन लिया तुमने वर्तमान

बदले में

दे दिया भविष्य

कह दिया-

समय अनंत, शाश्वत है

हम सब चिर कालिक हैं

और हम सह गये

छल, झूठ, प्रवंचना

छीन ले गये तुम

क्षण की पूजा

सुख की अर्चना

जब कभी एक क्षण

डूबने का आया

और हम डूबने ही वाले थे

कि तुमने हमें

बचा लिया

कहने लगे-

जीवन कभी मरता नहीं

तुम्हारे ज्ञान, विज्ञान, दर्शन

हमें घेरे रह गये

और हम लुट गये

हमसे वे छूट गये

जो हमें प्यारे थे

हमारा क्षण मर गया

और तुम जी गये

हमारा रक्त पीकर

ओ, रक्तबीज तुम !

कभी भूमा

कभी पुरुष सहस्त्रशीर्षा

अज्ञेय बन आते रहे

चुगते रहे

हमारे अमूल्य क्षण

और हम चुकते रहे

ओ सहस्त्राक्ष, सहस्त्रपात

पूछते हैं हम तुमसे

कहाँ है सत्य

और हमारा कालातीत फैलाव

क्यों तुम अमर

हमें कहते रहे

और हम मरते रहे

भविष्य के लिये ?

नहीं

अब हम

नहीं जियेंगे भविष्य,

सीमाबद्ध वर्त्तमान

यह जीवन हम

जियेंगे।

-अशोक 'अशु'


___________________________

Monday, February 4, 2008

कोहबर लीखली कौसल्या रानी

बड़ा रे जतन सैं हे

एक ओरी लिखली सासु हे अलरी-झलरी

एक ओरी सोहाग लिखली हे

मुहँमा उघारी सुहवे के देखियन

कौने कौने अभरन हे

हाँथ कंगन सासु हे बाबा देलन

सिकरी मोहे के भैया देलन हे

सिर के सिन्दूर प्राभोजी अहैं देलि

ईहो तिनों अभरन हे


-प्रस्तुति- नीतु सिंह्
लड़का के शादी का गीत

नीले-नीले गइया के नीले रंग बछेरवा हो
ना खाले हो
ऊ जे लाभी लूभी दूभिया
लाभि लूभी दूभिया से ना खाले बछेरवा हो
मांगेला हो अंजानो असवरवा
जब हो अंजानो दुलहा घोरा अस्अवार भेल
अम्मा धैले हो
बबुआ घोरा के लगमिया
तुहुँ त जे जाइछ बबुआ लाढो के उ देसवा हो
देले जइह हो बबुआ दुधवा के गुनवा
जाले जीयब अम्मा ताले काँवर ढोयेबो हे
लाढो होयेतो हे
अम्मा तोहरो चेरीयवा
_________________________

अहे कौंने कियरिया में दौवना मड़ुअवा हे
कौंने कियरिया में धान
अहे कौने कियरिया में खरा भेल अंजानो दुलहा
घरिये घरीये चुए रूप
अहे अगला कियरिया में दवना मड़ुअवा हे
पिछला कियरीया में धान
अहे बिचला कियरीया में खरा भेल अंजानो दुलहा
घरिये घरिये चुए रूप
अहे किये तोरा अहो बबुआ सँचवा के ढेओरल
किये तोरा गढले सोनार
अहे नये मोरा अहे सासु सँचवा के ढेओरल
नये मोरा गढले सोनर
अहे माता कौसिल्या के कोखिया जनम लिहले
सुरति दिहले भगवान्
_________________________________

नदिया किनारे नैया लागे रे
झमकि बुन्द बरसे
साला ससुर मौरिया भेजे रे
अजब लड़िया लागे
नदिया-------
साला ससुर जोरवा भेजे रे
अजब टैया लागे
साला ससुर चैनवा भेजे रे
अजब लौकेट लागे
साला ससुर जुतवा भेजे रे
अजब मोजवा लागे
नदिया किनारे—
__________________________

सात रे महलिया के एके रे दूअरिया
निकले अंजानो दुलहा पापा से चोरिया

पापा उनकर पूछेली बउआ हो दूलरुआ
के रे सम्हारत एहो सिर मौरिया

मलिया के ललमल अंजानो बहनोइया
ओहे रे सम्हारत एहो सीर मौरिया

सात रे------------------------

पापा उनकर-----------------
के रे सम्हारत एहो अंग जोरवा

दरजी के जलमल अंजानो बहनोइया
ओहे रे सम्हारत एहो अंग जोरवा

सात-------------------------

पापा---------------------------
के रे सम्हारत एहो पैर जूतवा

चमरा के जलमल अंजानो बहनोइया
ओहे रे सम्हारत एहो पैर जूतवा
____________________________
(किसी पागल ने कभी कोई पिण्ड किसी दरगाह से लाकर इस गाँव के बगीचे में रख दिया। तबसे लोगों ने इस पिण्ड की पूजा करना शुरू कर दिया। इसके बाद से कभी कोई शादी इस पिण्ड के आशिर्वाद के बगैर नहीं होता। इन्हे मियाँ बाबा के रूप में पूजा जाता है। इन्हीं के सम्मान में यह गीत गाया जाता है।)

लटी पटी पगिया मियाँ सबुजी कमैनियाँ
रैनी गजाधर साजिद अलबेला

तू मति भुलिहा मियाँ भुलिहा बेसरिया
रैनी गजाधर साजिद अलबेला

हाथ गुलेल मियाँ सबुजी कमैनिया
रैनी गजाधर साजिद अलबेला
_____________________________

सासु ननदिया हे मियँमा रखौल मेरो नाम
की छोर हो बझिनिया मेरो नाम

रंगली रूमलवा हे मियँमा चढैबो दरगाह
कि छोर हो बझिनिया मेरो नाम

काली ओ खसिया हो मियमाँ चढैबो दरगाह
कि छोर--------

दुधा के पेयलिया हे -------
कि छोर--------

खैनिया तमकुला हे मि----------
कि छोर-------------------

____प्रस्तुति- नीतु सिंह्

_____________________________

Tuesday, January 22, 2008

कोहबर गीत

घर पीछुवरवा लौंग के र गछिया

सखीइ हे, लौंग चुएला सारि रात 2

लौंग चुनीए चुनि भरली चंगेरिया

सखी हे, लौंग के चोलिया सिलाएब 2

सखी हे

कहाँ से मंगाएब झिलमील सरीया

सखी हे, कहाँ से मंगाएब अच्छा दरजी 2

सखी हे

पटना से मंगाएब झीलिमीलि सरिया

सखी हे, छपरा से मंगाएब अच्छा दरजी

सखी हे

अगल-बगल सीहे दरजी मोर रे मजुरवा

सखी हे, छतिया पर दीहे दुनो मोर 2

स्खी हे

चोलिया पहीरि हम सूतलि अंगनवा

सखी हे,जौरे भए राजाजी के बेटा 2

सखी हे जौरे -----

अगल घुस्कु बगल घुस्कु राजा जी के बेटा

सखी हे, रऊरे घम चुन्दरिया मैल होत 2

सखी हे

होवे दहू होवे दहू आजु के रे रतिया

सखी हे, भोरे उठी धोबिया घर धोवायब 2

सखी हे

राजा जी के बेटवा बरा रंगरसीया

सखी हे, चोलिया ममोरि रस लेत 2

सखी हे

धोवे के धोइहे धोबिया गंगा किनरवा

सखी हे, सुखइहे कदम्ब के छाँव 2

सखी हे

प्रस्तुति- नीतू सिंह्