Thursday, February 14, 2008

परबत ऊपर बोयेलो लौयेंगिया
छछन बीछन भइले डाढ


घामले घुमले अयेलन अनजानो दुलहा
तोड़ले लौयेंगिया के र डाढ


दुअरे बइठल रउरा बाबु अनजा बाबु
मालिन ओलहनवा लेले ठाढ


बरजू अनजानो बाबू अपनी दूलरुआ
तुड़ले लवंगिया के र डाढ


बालक रहतो गे मालिन बरजल जइतो
छैला बरजलो न जाए


प्रस्तुति- मृदुला सिन्हा

1 comment:

आलोक said...

नमितांशु जी,
आज ही आपका चिट्ठा चिट्ठाजगत पर मिला। जानना चाहूँगा कि यह कौन सी बोली में लिखित है?

बढ़िया है!