सामने
निगाहों के सामने
होता है कभी
कोई झुरमुट हरा-भरा
कभी दीवार कॉंक्रीट का खड़ा
जिसके पास है शहर
जिसमें बसते हैं बशर
नालों के किनारे--
निगाहों के सामने
कभी कोई सिलसिला
हरी वादियों का,
कभी सहरा
बेआबादियों का
और ऐसे ही कभी
होता है है निगाहों में
तिलिस्मों की बेहुदूद जमीन
जिससे मिलता है उफक
इन्द्रधनुसी रंगें बिखेरकर
वहीं रहती हो तुम
हक़ीक़तों से दूर दूर
और हम हैं यहाँ
बस यूँ ही मजबूर!
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वो भी
बरसात में भीगे नये पत्तों से
टपकते बूँदों को
मन की जमीन पर
महसूसता हूँ
बन्द आँखों में
शायद, याद आ गयी हो तुम---
क्या हुआ था ?
फटे पन्ने
किताबों के
उड़ रहे है
गिर्दो-पेश मेरे,
तुम चली गयी हो कहीं
ख़फा होकर--
सामने कैनवास पर
लहराती है लकीर
तुम्हारे बदन की ढलान सी,
कामिनी के फूल
खिल रहे हैं कहीं,
उफ्फ!
ये नटखट मेरे मन का किशोर
भटकाता है मुझे
सरगोशियों में
बीते हसीन वादियों में---
--नमितांशु
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