Thursday, February 14, 2008

आहत स्वाभिमान

चिलचिलाती धूप में भी
उड़ती रही चिड़िया
आकाश में दिन भर
बादल का एक टुकड़ा
चलता रहा उसके सिर पर
लगातार
भूल गई है दुपट्टा आज जल्दी में


छाँह में
अलसाए गिद्ध ने रोककर उसे
भर लिया अपने अंक में जबरिया


आहत स्वाभिमान
बसों-ट्रकों के नीचे दब-कुचल रही है
उसके लहू से अभिसिंचित आकाश
तेजी से बदल रहा है रंग
दिशा बदलकर फिर
भागने लगा है शहर

कचरे में बचपन ढूँढते बच्चे
आज फिर हुए निराश

एक तेज शरगोशी
दौड़ रही है कानों-कान
कल फिर छपेगा अखबार
-पुश्पेन्द्र फाल्गुन, नागपुर

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