॥कला-साधना॥
अन्धेरी घाटियों की
भूल-भुलैया में
मौत के भयंकर अज्दहों से
पंजा लड़ाता रहा
अकेला मैं
रक्त से लथपथ
हो गये मेरे हाथ-पाँव
थकता गया, हारता गया
रक्त के सैलाब में बहता गया मैं
लेकिन मेरी आँखें
सुदूर आकाश के
श्वेत-पुष्पों पर टंगी थीं
मौत की स्याह चादर में
ममता ढूँढता रहा माँ की
सौन्दर्य-किरणों के
कोमल-स्पर्श की
कामना करता रहा
आग के दरिया में
बहता रहा
लेकिन आँखें
किनारे पर खिले गुलाबों पर
टिकी रहीं
कई बार
मौत की बाँहे
खींच ले गयीं
अपनी गोद में
लेकिन मेरी आँखें
जीवन की कमनीय सौन्दर्य की
मोहकता आँकती रही
मुझे पुकारती रही मौत
और उसी की गोद में
दुबका मैं
जीवन तराशता रहा
यह रहस्यमय खेल
चलता रहा
मैं धीरे-धीरे गलता रहा
बर्फ सा
मौत की धीमी आँच में
हारता रहा मैं
लेकिन हार नहीं मानी
मरता रहा पर
मौत नहीं जानी
मीठी जहर-सी मौत
मुझे बहुत प्यार करती है
और, मुझे इससे नफरत है
इसी नफरत की आग में
प्रेम के उजले फूल
उगाता हूँ
मृत्यु की गोद में
जीवन के गीत गाता हूँ
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॥आत्मन॥
मत घेरो हमें
प्रवंचना की दीवारों से
प्रलोभन की लकीरों से
मत घेरो
शास्वत सत्य अपने
बन्द करो बक्सों में
और हमें जीने दो
जब कभी
सन्धि के दो क्षण
हमें नसीब हुए
छीन लिया तुमने वर्तमान
बदले में
दे दिया भविष्य
कह दिया-
’समय अनंत, शाश्वत है
हम सब चिर कालिक हैं’
और हम सह गये
छल, झूठ, प्रवंचना
छीन ले गये तुम
क्षण की पूजा
सुख की अर्चना
जब कभी एक क्षण
डूबने का आया
और हम डूबने ही वाले थे
कि तुमने हमें
बचा लिया
कहने लगे-
’जीवन कभी मरता नहीं’
तुम्हारे ज्ञान, विज्ञान, दर्शन
हमें घेरे रह गये
और हम लुट गये
हमसे वे छूट गये
जो हमें प्यारे थे
हमारा क्षण मर गया
और तुम जी गये
हमारा रक्त पीकर
ओ, रक्तबीज तुम !
कभी भूमा
कभी पुरुष सहस्त्रशीर्षा
अज्ञेय बन आते रहे
चुगते रहे
हमारे अमूल्य क्षण
और हम चुकते रहे
ओ सहस्त्राक्ष, सहस्त्रपात
पूछते हैं हम तुमसे
‘कहाँ है सत्य
और हमारा कालातीत फैलाव
क्यों तुम अमर
हमें कहते रहे
और हम मरते रहे
भविष्य के लिये ?’
नहीं
अब हम
नहीं जियेंगे भविष्य,
सीमाबद्ध वर्त्तमान
यह जीवन हम
जियेंगे।
-अशोक 'अशु'
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