उत्तर भारत के संग्रहालयों में जो समानता मिलती है उनमें सबसे महत्वपूर्ण हैं विखंडित मूर्तियाँ का संग्रह जो बदहाली के बावजूद भी अपनी ख़ूबसूरत अतीत के बारे में बहुत कुछ कहती हैं रहीं. वो कभी किसी भव्य मन्दिर के गर्भगृह में शोभित रही होंगी; लोगों के श्रद्धा का केन्द्र रही होंगी. संग्रहालयों के अतिरिक्त ऐसी हजारों मूर्तियाँ आज भी जहाँ तहाँ छोटी-बड़ी मन्दिरों में पूजित हैं. ऐसी खंडित मूर्तियों को देखकर सहज ही मन में उठता है- क्या ख़ूबसूरत होना ही इनका गुनाह था? आस्था का आधार होना भी क्या गुनाह है? एक इंसान किसी प्रेरणा के वशीभूत पत्थरों में जान डालने की कोशिश करता, तो कोई दूसरा किसी और प्रेरणा के चलते उन्हें तोड़कर, उन्हें अपनी ठोकरों में डालकर खुश होता है. खैर! इन खंडित मूर्तियों को देखकर एक हिन्दु मन में टीस तो उठता ही है. यह गौर करने की बात है कि सारे उत्तर भारत में प्राचीन या मध्यकाल का एक भी मन्दिर अवशेश नहीं मिलता। क्यों? क्योंकि उन्हें तोड़ डाला गया. फिर से वही टीस! ----
कोई चाहे तो मन में उठनेवाले इस टीस को एक प्रतिकृया का रूप भी दे सकता है. लेकिन इस्लाम की आक्रामकता और संकीर्णता से परे नजर हटाकर देखने पर ऐसी तमाम बातें मिलती हैं जिनसे मिलकर एक सभ्यता का ताना-बाना बनता है. संग्रहालयों में खंडित मूर्तियों से नजरे हटाकर देखने पर एक पूरी संस्कृति का कैनवास मिलता है, जिसकी खूबसूरती अपने वक्त की इंसानी तहजीब का भरपूर अक्कासी करता है. इस्लाम का भारत के साथ का जुड़ाव चाहे कितना ही रक्त्रंजित या त्रासदीभरा रहा हो लेकिन वह तस्वीर का एक पहलू मात्र है. इससे अलग एक समूचा तहजीबी किताब है जो भारतीयता का ही प्रतिनिधि है. इस्लाम का भारतीयता के साथ जो सम्बन्ध विकसित हुआ वह इस देश के हिन्दु, और मुसलमान का शरीकी पूँजी जैसा है जिसे किसी प्रकार अलग नहीं किया जा सकता. सच तो यह है कि हिन्दुस्तानी तहजीब के चादर को फिरके वारियत के पागल्पन में टुकरे-टुकरे किया जा सकता है, उसके रेशों को अलग नहीं किया जा सकता. हर-एक हिन्दु में एक मुसल्मान भी है और हर एक मुसल्मान में एक हिन्दु भी है. हमारा व्यक्तित्व अक्सर ही प्लूरल होता है. निदा फाजली का आदमी आज की हकीकत है,
हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
जिसको भी देखना हो, कई बार देखना
मुझे लगता है कि म्यूजियम में टूटी मूर्तियों को देखकर एक मुसलमान को भी अच्छा नहीं लगता, उसे भी अन्दर में कुछ टूट गया सा अहसास होता है, खूबसूरती के बिखर जाने की टीस उसके मन में भी होता है. और, क्या, हिन्दु मुर्तियाँ नहीं तोड़ते, खूबसूरती को नहीं उजारते? यह तो इंसानी फितरत है, जो सबकी हकीकत को एक ही आईने में देखने से प्रकट हो जाती है. अक्सर हम अपना चेहरा सुविधानुसार एक आईने में देखते हैं तो किसी और का चेहर किसी विकृत आईने में दिखाते हैं.

1 comment:
नमितअंशु जी, टिप्पणी करने के लिये धन्यवाद. आपने सही कहा ब्लागिंग से जानकारी बढ़ती है. और अब तो हिन्दी ब्लागिंग में ही बढोतरी हो रही है.
"शुक्रिया" कहने से भी मैं उतना ही खुश हुआ हूँ जितना धन्यवाद कहने पर होता... वैसे मैं आपका आशय समझ नहीं पाया शायद..शायद आपने भाषा के संदर्भ में ऐसा कहा!!!
धन्यवाद..
तपन शर्मा
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