Monday, August 4, 2008

सोल्झेनित्स्यीन्

04-08-2008

रिस्ते भी अजीब अजीब होते हैं. ढूँढिये तो हर जगह निकल आयेंगे. आज की एक खबर है कि सोल्जेनित्स्यीन नहीं रहे. एक महान साहित्यकार से उसके हर चाहनेवाले का रिस्ता होता है, उन चाहनेवाले में अक्सर उसके पाठक होते हैं. उनसे मेरा ऐसा कोई रिश्ता नहीं रहा.मैनें उनकी कोई रचना पढी नहीं. हाँ, उनके बारे में सुना जरूर है, कुछ को देखा भी है. पापा की लायब्रेरी में उनकी कैसर वार्ड से मेरा नज्दीकी ताल्लुकात रहा है. गहरे नारंगी रंग की पेपरबैक संसकरण की यह किताब पापा के टेबुल पर कई महीनों तक शोभित रहा. यह किताब मेरे रोज की आमदनी का स्रोत था. पापा मेरे लिये इसी किताब के पन्नों के बीच रुपये रखकर कहीं जाया करते. मैं कहीं से आता या पढाई कर उठता तो होटल की तरफ मुखातिब होने से पहले कैंस्र वार्ड के पन्नों के बीच रुपयों के लिये टटोला करता. इस किताब ने मुझे शायद ही कभी निराश किया हो. मिड्ल स्कूल के उन प्रारम्भिक दिनों में मैं इस किताब को जब भी देखता एक विश्वाशपूर्ण खुशी मिलती. इस के पन्नों के बीच से मेरे लिये पेट-पूजा का जुगार भी होता था तो इसी की बदौलत चम्पक,पराग, नन्दन जैसी पत्रिकाओं के अलावे उन कौमिक्सों का भी लुत्फ मिलता जो मैं पापा से छुपाकर ही पढता था. इस किताब के पहले पन्ने पर पापा के अंतरंग मित्रों में एक नागेश्वर पाठक का आंग्रेजी में किया गया हस्ताक्षर था जो निश्चय ही उसके मालिकाना हक को दर्शाती थी. हालाँकी मुझे यह पता था कि कैंसर वार्ड को सोल्जेनित्स्यीन ने लिखा है. बाद में जाना कि इस महान लेखक ने और भी कई कृतियाँ लिखीं जो उसके संघर्षपूर्ण जीवन की हकीकतों, खूबसूरत अहसासों, खयालों की अक्कासी करता है. उनकी किताबों के नाम सामान्य-ज्ञान बढाने की दृष्टि से याद रखना भी जरूरी था. अफसोस कि उन किताबों में से किसी एक को भी पढने की हिम्मत नहीं जुटा पाया. अगर पढा होता तो उनके बारे में, उनसे मेरे रिश्ते के बारे में कुछ कहनें में संकोच महसूस नहीं होता. उनके नहीं होने की खबर से जो एक खालिपन सा लगा वह अनायास हे मुझे पच्चीस साल पहले खींच ले गया जहाँ पहुँच्कर, ऐसा लगता है, पापा की वो टेबुल खाली पड़ी है, शायद, उस कैंसर वार्ड को उसके मालिक वापस ले गये!

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