Thursday, February 14, 2008
चिलचिलाती धूप में भी
उड़ती रही चिड़िया
आकाश में दिन भर
बादल का एक टुकड़ा
चलता रहा उसके सिर पर
लगातार
भूल गई है दुपट्टा आज जल्दी में
छाँह में
अलसाए गिद्ध ने रोककर उसे
भर लिया अपने अंक में जबरिया
आहत स्वाभिमान
बसों-ट्रकों के नीचे दब-कुचल रही है
उसके लहू से अभिसिंचित आकाश
तेजी से बदल रहा है रंग
दिशा बदलकर फिर
भागने लगा है शहर
कचरे में बचपन ढूँढते बच्चे
आज फिर हुए निराश
एक तेज शरगोशी
दौड़ रही है कानों-कान
कल फिर छपेगा अखबार
-पुश्पेन्द्र फाल्गुन, नागपुर
Wednesday, February 13, 2008
वो भी
निगाहों के सामने
होता है कभी
कोई झुरमुट हरा-भरा
कभी दीवार कॉंक्रीट का खड़ा
जिसके पास है शहर
जिसमें बसते हैं बशर
नालों के किनारे--
निगाहों के सामने
कभी कोई सिलसिला
हरी वादियों का,
कभी सहरा
बेआबादियों का
और ऐसे ही कभी
होता है है निगाहों में
तिलिस्मों की बेहुदूद जमीन
जिससे मिलता है उफक
इन्द्रधनुसी रंगें बिखेरकर
वहीं रहती हो तुम
हक़ीक़तों से दूर दूर
और हम हैं यहाँ
बस यूँ ही मजबूर!
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वो भी
बरसात में भीगे नये पत्तों से
टपकते बूँदों को
मन की जमीन पर
महसूसता हूँ
बन्द आँखों में
शायद, याद आ गयी हो तुम---
क्या हुआ था ?
फटे पन्ने
किताबों के
उड़ रहे है
गिर्दो-पेश मेरे,
तुम चली गयी हो कहीं
ख़फा होकर--
सामने कैनवास पर
लहराती है लकीर
तुम्हारे बदन की ढलान सी,
कामिनी के फूल
खिल रहे हैं कहीं,
उफ्फ!
ये नटखट मेरे मन का किशोर
भटकाता है मुझे
सरगोशियों में
बीते हसीन वादियों में---
--नमितांशु
Thursday, February 7, 2008
lamhon ke karwein ruk jaate hain jab
thithurte patton ke aas paas,
karahata hai koii ukhre-ukhre sanson mein
mere paas, mere rooh ke girdo-pesh,
gunagunaataa hoon main bewajah
shivranjani ke suron ko,
aisa lagta hai jagti ho tum
door kahin,
chawnkkar khwabon se
bhatakte suron ke dastak pe
gahan nisshabd ratri mein।
फिर, gaataa hoon main jhoomkar
drut shivranjani
apne ansuon ko choomkar
tumko sunane ko, ya
khud ko बहलाने को
gaamjan hain phir se
lamhon ke kaarwen
ek subah ki ore--
namit, 19.01.03
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kya sundar chehra kavita hai?
haan! sundar chehra kavita hai
kyon?
kyonki maine dekha indradhanush ko
faila apne maanas tal par
aabhaa uske sundar mukh ka,
thithure thande paani se jab
dhota tha main kapre apne,
subah subah thi jare ki tab!
18.01.03
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tere bahane basi thijo ek basti
weeran ho rahi ujar rahi hai
purane koliyari ki mallika
ho rahi hai jamin yahan ki sasti
masti bhi kho rahi hai is jahan ki
sanwlapan utawlapan tera
panakta tha dekhkar mera bankpan
kshitij par lautti hai wo kashti
17.03.04
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॥कला-साधना॥
अन्धेरी घाटियों की
भूल-भुलैया में
मौत के भयंकर अज्दहों से
पंजा लड़ाता रहा
अकेला मैं
रक्त से लथपथ
हो गये मेरे हाथ-पाँव
थकता गया, हारता गया
रक्त के सैलाब में बहता गया मैं
लेकिन मेरी आँखें
सुदूर आकाश के
श्वेत-पुष्पों पर टंगी थीं
मौत की स्याह चादर में
ममता ढूँढता रहा माँ की
सौन्दर्य-किरणों के
कोमल-स्पर्श की
कामना करता रहा
आग के दरिया में
बहता रहा
लेकिन आँखें
किनारे पर खिले गुलाबों पर
टिकी रहीं
कई बार
मौत की बाँहे
खींच ले गयीं
अपनी गोद में
लेकिन मेरी आँखें
जीवन की कमनीय सौन्दर्य की
मोहकता आँकती रही
मुझे पुकारती रही मौत
और उसी की गोद में
दुबका मैं
जीवन तराशता रहा
यह रहस्यमय खेल
चलता रहा
मैं धीरे-धीरे गलता रहा
बर्फ सा
मौत की धीमी आँच में
हारता रहा मैं
लेकिन हार नहीं मानी
मरता रहा पर
मौत नहीं जानी
मीठी जहर-सी मौत
मुझे बहुत प्यार करती है
और, मुझे इससे नफरत है
इसी नफरत की आग में
प्रेम के उजले फूल
उगाता हूँ
मृत्यु की गोद में
जीवन के गीत गाता हूँ
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॥आत्मन॥
मत घेरो हमें
प्रवंचना की दीवारों से
प्रलोभन की लकीरों से
मत घेरो
शास्वत सत्य अपने
बन्द करो बक्सों में
और हमें जीने दो
जब कभी
सन्धि के दो क्षण
हमें नसीब हुए
छीन लिया तुमने वर्तमान
बदले में
दे दिया भविष्य
कह दिया-
’समय अनंत, शाश्वत है
हम सब चिर कालिक हैं’
और हम सह गये
छल, झूठ, प्रवंचना
छीन ले गये तुम
क्षण की पूजा
सुख की अर्चना
जब कभी एक क्षण
डूबने का आया
और हम डूबने ही वाले थे
कि तुमने हमें
बचा लिया
कहने लगे-
’जीवन कभी मरता नहीं’
तुम्हारे ज्ञान, विज्ञान, दर्शन
हमें घेरे रह गये
और हम लुट गये
हमसे वे छूट गये
जो हमें प्यारे थे
हमारा क्षण मर गया
और तुम जी गये
हमारा रक्त पीकर
ओ, रक्तबीज तुम !
कभी भूमा
कभी पुरुष सहस्त्रशीर्षा
अज्ञेय बन आते रहे
चुगते रहे
हमारे अमूल्य क्षण
और हम चुकते रहे
ओ सहस्त्राक्ष, सहस्त्रपात
पूछते हैं हम तुमसे
‘कहाँ है सत्य
और हमारा कालातीत फैलाव
क्यों तुम अमर
हमें कहते रहे
और हम मरते रहे
भविष्य के लिये ?’
नहीं
अब हम
नहीं जियेंगे भविष्य,
सीमाबद्ध वर्त्तमान
यह जीवन हम
जियेंगे।
-अशोक 'अशु'
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Monday, February 4, 2008
नीले-नीले गइया के नीले रंग बछेरवा हो
ना खाले हो
ऊ जे लाभी लूभी दूभिया
लाभि लूभी दूभिया से ना खाले बछेरवा हो
मांगेला हो अंजानो असवरवा
जब हो अंजानो दुलहा घोरा अस्अवार भेल
अम्मा धैले हो
बबुआ घोरा के लगमिया
तुहुँ त जे जाइछ बबुआ लाढो के उ देसवा हो
देले जइह हो बबुआ दुधवा के गुनवा
जाले जीयब अम्मा ताले काँवर ढोयेबो हे
लाढो होयेतो हे
अम्मा तोहरो चेरीयवा
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अहे कौंने कियरिया में दौवना मड़ुअवा हे
कौंने कियरिया में धान
अहे कौने कियरिया में खरा भेल अंजानो दुलहा
घरिये घरीये चुए रूप
अहे अगला कियरिया में दवना मड़ुअवा हे
पिछला कियरीया में धान
अहे बिचला कियरीया में खरा भेल अंजानो दुलहा
घरिये घरिये चुए रूप
अहे किये तोरा अहो बबुआ सँचवा के ढेओरल
किये तोरा गढले सोनार
अहे नये मोरा अहे सासु सँचवा के ढेओरल
नये मोरा गढले सोनर
अहे माता कौसिल्या के कोखिया जनम लिहले
सुरति दिहले भगवान्
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नदिया किनारे नैया लागे रे
झमकि बुन्द बरसे
साला ससुर मौरिया भेजे रे
अजब लड़िया लागे
नदिया-------
साला ससुर जोरवा भेजे रे
अजब टैया लागे
साला ससुर चैनवा भेजे रे
अजब लौकेट लागे
साला ससुर जुतवा भेजे रे
अजब मोजवा लागे
नदिया किनारे—
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सात रे महलिया के एके रे दूअरिया
निकले अंजानो दुलहा पापा से चोरिया
पापा उनकर पूछेली बउआ हो दूलरुआ
के रे सम्हारत एहो सिर मौरिया
मलिया के ललमल अंजानो बहनोइया
ओहे रे सम्हारत एहो सीर मौरिया
सात रे------------------------
पापा उनकर-----------------
के रे सम्हारत एहो अंग जोरवा
दरजी के जलमल अंजानो बहनोइया
ओहे रे सम्हारत एहो अंग जोरवा
सात-------------------------
पापा---------------------------
के रे सम्हारत एहो पैर जूतवा
चमरा के जलमल अंजानो बहनोइया
ओहे रे सम्हारत एहो पैर जूतवा
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(किसी पागल ने कभी कोई पिण्ड किसी दरगाह से लाकर इस गाँव के बगीचे में रख दिया। तबसे लोगों ने इस पिण्ड की पूजा करना शुरू कर दिया। इसके बाद से कभी कोई शादी इस पिण्ड के आशिर्वाद के बगैर नहीं होता। इन्हे मियाँ बाबा के रूप में पूजा जाता है। इन्हीं के सम्मान में यह गीत गाया जाता है।)
लटी पटी पगिया मियाँ सबुजी कमैनियाँ
रैनी गजाधर साजिद अलबेला
तू मति भुलिहा मियाँ भुलिहा बेसरिया
रैनी गजाधर साजिद अलबेला
हाथ गुलेल मियाँ सबुजी कमैनिया
रैनी गजाधर साजिद अलबेला
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सासु ननदिया हे मियँमा रखौल मेरो नाम
की छोर हो बझिनिया मेरो नाम
रंगली रूमलवा हे मियँमा चढैबो दरगाह
कि छोर हो बझिनिया मेरो नाम
काली ओ खसिया हो मियमाँ चढैबो दरगाह
कि छोर--------
दुधा के पेयलिया हे -------
कि छोर--------
खैनिया तमकुला हे मि----------
कि छोर-------------------
____प्रस्तुति- नीतु सिंह्
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