Monday, March 24, 2008

इशमेला की होली

फगुआ फाग खेलन को जनकपुर आयहु राज दुलार
फगुआ फा----
आयहु राज दुलार हो
आहो आयहु राज दुलार
फगुआ फाग खे---
कोयल कुहुके पपिहा पिहके देख बसंत बहारा
गृह-गृह युवति होली खेले कंचन कलश हजार
फगुआ फाग खे-----
धौंसा धमके तबला ठनके, राजा जनक जी के द्वारा
रंगमहल मिथिलेशकिशोरीसंग लिये सखियाँ हजार
फगुआ फाग खेलन को जनकपुर आयहु राजदुलार
जनक दुलारी अबिर लिये झोरी, केसर राजदुलारा
मचेउ धराधर रंगमहल में, शोभा अगम अपार
फगुआ फाग-----
रामजी रंग सिया पर छिड़के, सखियाँ देत ललकारा
नन्द कुमार अबिर अभरख से, भर गये शहर बजार
फगुआ फाग-----

रचयिता- स्वर्गीय नन्दकुमार त्रिपाठी


होरी रंग से भरी राजा दसरथ के दरबार
होरी रंग-----
दसरथ के दरबार हो
आहो दसरथ के दरबार
होरी रंग----
सरयू तीर अयोध्या नगरी, कंचन जड़त केवारा
मणि माणिक के खम्भ जड़त है, कुन्डी जरत हजार
होरी रंग से-----
बेला चमेली चहु दिशी गमके, केवरा इतर गुलाबा
रतन सिन्हासन राजित राजा दशरथ, केसर के फुहुकार
होरी------
विश्वामित्र वशिस्ठ जी के चेले, दसरथ जनक दुलारा
रनिवासन से चले पिचकारी, मानौ गंगाजी के धार
होरी रंग-----
लाल गुलाल लाल भये बादर, लाल भये गुरुद्वारा
नन्द कुमार लाल भये राजा, लाल भये सुत चार
होरी रंग से ------
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आज सखी सैयाँ आवत होइहैं, बाँये नयन फड़के
आज सखी----
बायें नयन फड़के कि हो
आहो बाँये नयन फड़के आज सखी सैयाँ-----
उड़ि-उड़ि कागा पलंग चढी बइठे, बोलिया बोलत सगुन के2
चहूँ ओर झाल झमाझम बाजै, चोलिया के बन्द सरकै
आज सखी----
आहो बाँये नयन फड़के---2
आज सखी सै----
अचरा फड़कै पुपुनी फड़कै, रही रही जियरा धड़कै2
चढल जवानी उमरिया कि थोड़ी, पतरी कमर लचकै
आज सखी---
आहो बाँये नयन----2
आज सखी----
सूतल रहलि सपन एक देखनी,पिया संग सोवै लिपट के
औचक आये जगाये दियो हैं, सास ननद धर के
आज सखी----
अबिर गुलाल कुंकुमा केसर, घर घर अभरख झलकै
नन्द कुवँर पिय आये गयो हैं, तिरछी मुकुट धरकै
आज सखी----



इशमेला की होली

 होली गीत
काशी धूम मचे आज पशुपति खेलत फाग
काशी---------
पशुपति खेलत फाग हो
आहो पशुपति खेलत फाग
काशी धूम --------
शंकर के कर डमरू बिराजै, भुत-बैताल लिये झाला
नाच कूद के होली गावे, पहिरे गले मुंड माल
काशी धूम----
साँची मगही गुलाबी बीड़ा, कंचन थाल मशाला
इतसे शंकर भांग धतूरा, चन्द्र विराजत भाल
काशी धूम ------
हीरा जड़ित कनक पिचकारी, नौ मन उड़त गुलाला
भर पिचकारी गौरा जी पर मारे, गौरा हो गयी लाल
काशी धूम मचै--------
भैरो के सिर पाग रंगाये, कुसुम रंगाये बैताला
नन्द कुँवर सिर सोहे गौरा के, शंकर के मृग छाल
काशी धूम----

--रचयिता स्वर्गीय नन्द कुमार त्रिपाठी
ग्राम - - इशमेला , सारण , बिहार


Thursday, February 14, 2008

परबत ऊपर बोयेलो लौयेंगिया
छछन बीछन भइले डाढ


घामले घुमले अयेलन अनजानो दुलहा
तोड़ले लौयेंगिया के र डाढ


दुअरे बइठल रउरा बाबु अनजा बाबु
मालिन ओलहनवा लेले ठाढ


बरजू अनजानो बाबू अपनी दूलरुआ
तुड़ले लवंगिया के र डाढ


बालक रहतो गे मालिन बरजल जइतो
छैला बरजलो न जाए


प्रस्तुति- मृदुला सिन्हा
आहत स्वाभिमान

चिलचिलाती धूप में भी
उड़ती रही चिड़िया
आकाश में दिन भर
बादल का एक टुकड़ा
चलता रहा उसके सिर पर
लगातार
भूल गई है दुपट्टा आज जल्दी में


छाँह में
अलसाए गिद्ध ने रोककर उसे
भर लिया अपने अंक में जबरिया


आहत स्वाभिमान
बसों-ट्रकों के नीचे दब-कुचल रही है
उसके लहू से अभिसिंचित आकाश
तेजी से बदल रहा है रंग
दिशा बदलकर फिर
भागने लगा है शहर

कचरे में बचपन ढूँढते बच्चे
आज फिर हुए निराश

एक तेज शरगोशी
दौड़ रही है कानों-कान
कल फिर छपेगा अखबार
-पुश्पेन्द्र फाल्गुन, नागपुर

Wednesday, February 13, 2008

वो भी

सामने

निगाहों के सामने
होता है कभी
कोई झुरमुट हरा-भरा
कभी दीवार कॉंक्रीट का खड़ा
जिसके पास है शहर
जिसमें बसते हैं बशर
नालों के किनारे--

निगाहों के सामने
कभी कोई सिलसिला
हरी वादियों का,
कभी सहरा
बेआबादियों का
और ऐसे ही कभी
होता है है निगाहों में
तिलिस्मों की बेहुदूद जमीन
जिससे मिलता है उफक
इन्द्रधनुसी रंगें बिखेरकर

वहीं रहती हो तुम
हक़ीक़तों से दूर दूर
और हम हैं यहाँ
बस यूँ ही मजबूर!
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वो भी

बरसात में भीगे नये पत्तों से
टपकते बूँदों को
मन की जमीन पर
महसूसता हूँ
बन्द आँखों में
शायद, याद आ गयी हो तुम---



क्या हुआ था ?
फटे पन्ने
किताबों के
उड़ रहे है
गिर्दो-पेश मेरे,
तुम चली गयी हो कहीं
ख़फा होकर--



सामने कैनवास पर
लहराती है लकीर
तुम्हारे बदन की ढलान सी,
कामिनी के फूल
खिल रहे हैं कहीं,



उफ्फ!
ये नटखट मेरे मन का किशोर
भटकाता है मुझे
सरगोशियों में
बीते हसीन वादियों में---
--नमितांशु

Thursday, February 7, 2008

gahre nisshabda raatri mein

lamhon ke karwein ruk jaate hain jab

thithurte patton ke aas paas,

karahata hai koii ukhre-ukhre sanson mein

mere paas, mere rooh ke girdo-pesh,

gunagunaataa hoon main bewajah

shivranjani ke suron ko,

aisa lagta hai jagti ho tum

door kahin,

chawnkkar khwabon se

bhatakte suron ke dastak pe

gahan nisshabd ratri mein।



फिर, gaataa hoon main jhoomkar

drut shivranjani

apne ansuon ko choomkar

tumko sunane ko, ya

khud ko बहलाने को



gaamjan hain phir se

lamhon ke kaarwen

ek subah ki ore--





namit, 19.01.03

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kya sundar chehra kavita hai?

haan! sundar chehra kavita hai

kyon?

kyonki maine dekha indradhanush ko

faila apne maanas tal par

aabhaa uske sundar mukh ka,

thithure thande paani se jab

dhota tha main kapre apne,

subah subah thi jare ki tab!



18.01.03

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tere bahane basi thijo ek basti

weeran ho rahi ujar rahi hai

purane koliyari ki mallika

ho rahi hai jamin yahan ki sasti

masti bhi kho rahi hai is jahan ki

sanwlapan utawlapan tera

panakta tha dekhkar mera bankpan

kshitij par lautti hai wo kashti



17.03.04

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॥कला-साधना॥

अन्धेरी घाटियों की

भूल-भुलैया में

मौत के भयंकर अज्दहों से

पंजा लड़ाता रहा

अकेला मैं

रक्त से लथपथ

हो गये मेरे हाथ-पाँव

थकता गया, हारता गया

रक्त के सैलाब में बहता गया मैं

लेकिन मेरी आँखें

सुदूर आकाश के

श्वेत-पुष्पों पर टंगी थीं

मौत की स्याह चादर में

ममता ढूँढता रहा माँ की

सौन्दर्य-किरणों के

कोमल-स्पर्श की

कामना करता रहा

आग के दरिया में

बहता रहा

लेकिन आँखें

किनारे पर खिले गुलाबों पर

टिकी रहीं

कई बार

मौत की बाँहे

खींच ले गयीं

अपनी गोद में

लेकिन मेरी आँखें

जीवन की कमनीय सौन्दर्य की

मोहकता आँकती रही

मुझे पुकारती रही मौत

और उसी की गोद में

दुबका मैं

जीवन तराशता रहा

यह रहस्यमय खेल

चलता रहा

मैं धीरे-धीरे गलता रहा

बर्फ सा

मौत की धीमी आँच में

हारता रहा मैं

लेकिन हार नहीं मानी

मरता रहा पर

मौत नहीं जानी

मीठी जहर-सी मौत

मुझे बहुत प्यार करती है

और, मुझे इससे नफरत है

इसी नफरत की आग में

प्रेम के उजले फूल

उगाता हूँ

मृत्यु की गोद में

जीवन के गीत गाता हूँ

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॥आत्मन॥

मत घेरो हमें

प्रवंचना की दीवारों से

प्रलोभन की लकीरों से

मत घेरो

शास्वत सत्य अपने

बन्द करो बक्सों में

और हमें जीने दो

जब कभी

सन्धि के दो क्षण

हमें नसीब हुए

छीन लिया तुमने वर्तमान

बदले में

दे दिया भविष्य

कह दिया-

समय अनंत, शाश्वत है

हम सब चिर कालिक हैं

और हम सह गये

छल, झूठ, प्रवंचना

छीन ले गये तुम

क्षण की पूजा

सुख की अर्चना

जब कभी एक क्षण

डूबने का आया

और हम डूबने ही वाले थे

कि तुमने हमें

बचा लिया

कहने लगे-

जीवन कभी मरता नहीं

तुम्हारे ज्ञान, विज्ञान, दर्शन

हमें घेरे रह गये

और हम लुट गये

हमसे वे छूट गये

जो हमें प्यारे थे

हमारा क्षण मर गया

और तुम जी गये

हमारा रक्त पीकर

ओ, रक्तबीज तुम !

कभी भूमा

कभी पुरुष सहस्त्रशीर्षा

अज्ञेय बन आते रहे

चुगते रहे

हमारे अमूल्य क्षण

और हम चुकते रहे

ओ सहस्त्राक्ष, सहस्त्रपात

पूछते हैं हम तुमसे

कहाँ है सत्य

और हमारा कालातीत फैलाव

क्यों तुम अमर

हमें कहते रहे

और हम मरते रहे

भविष्य के लिये ?

नहीं

अब हम

नहीं जियेंगे भविष्य,

सीमाबद्ध वर्त्तमान

यह जीवन हम

जियेंगे।

-अशोक 'अशु'


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