एक अरसे से तलाश थी किसी ऐसे वेब्साइट की जहाँ से अपनी पसन्द की गीत और गजलें सुन पाउँ. जबसे अहसासों की दुनियाँ में होश सम्भाला जादूई आवाजें मुझे घेरने लगीं. फिल्मों के गाने तो काफी पहले से ही अपना एक असर रखती थी मगर नये उम्र की देहरी पर जब गजलें, ठुमरी और ऐसी ही गहरी असर रखनेवाली चीजों के नये पैगाम मेरे कानों में पडी तो मेरे अन्दर एक रीतिकालीन सुबह का अहसास जागा. आठवीं क्लास में पहुँचने से पहले पंकज उधास की गजलों से माहौल सराबोर था, मैं भी ‘चान्दी जैसा रंग है तेरा’ का मतलब समझने लगा था. ऐसी चीजों के साथ हरीओम शरण और अनुप जलोटा के भजनों का दिवाना दिल मेरा एक दिन अचानक ही गुलाम अली के ‘चुपके-चुपके..’ की महफिल के किसी कोने में दिल हार बैठा. चौदह पन्द्रह की वो दहलीजी असर काफी स्ट्रोंग था. गुलाम अली का पहला कैसेट मार्केट में आ चुका था. शुरु- शुरु में उन गजलों नें(या उनकी धुनों ने) मुझे कुछ खास प्रभावित नहीं कर सकीं. लेकिन, धीरे-धीरे गुलाम अली ने मुझे ऐसा दीवाना बनाया कि मैनें उन्हें न सिर्फ अपना सरताज बना लिया बल्कि औरों के ऐसा न करने पर कई बार गरमागरम बहस में भी खुद को उलझाया. इस समय मुझे ऐसे किसी भी शख्स से गहरी शिकायत हो सकती थी जो गुलाम अली की गायकी को किसी और गजल गायक से कमतर मानने की बात करता. पंकज उधास जैसे गजल गायकों को मैं एक प्रकार की हिकारत से देखने लगा. नये उम्र के उस पड़ाव पर भी मैं एक ‘क्रिटिक’ वाली हैसीयत का दावा करने लगा. पंकज उधास या चन्दन दास की गजलों के रिकौर्ड्स खरीदना मेरी समझ में एक ‘लो टेस्ट्’ जैसी चीज बन गया.
अगले दौर में, जब मैं मैट्रिक पास कर रहा था, मेहंदी हसन से मेरा साक्षातकार हुआ, और जल्द ही मेरी प्रतिबद्धता इनमें और गुलाम अली में बँट गयी. मेरे अन्दर इन दोनों की महानताओं को लेकर अक्सर ही अघोसित उठा-पटक चलने लगा. इस मुद्दे को लेकर दोस्तों से अच्छी खासी बहस हो जाती. धीरे-धीरे मेरे अन्दर का स्रोता मैच्योर होने लगा जिससे मुझे यह मानने में आसानी हुई की एक ही क्षेत्र में एक से अधिक महान हस्ति हो सकते हैं. दोनों की अपनी खास पहचान की समझ मुझमें आ गयी थी.
इसी सब के बीच जगजीत सिंह की कुछ गजलों ने मेरा ध्यान आकर्षित किया. खासकर, उनकी आवाज की मखमली इफेक्ट कमाल का लगता था. इसने मेरे मन में उनके लिये एक सम्मान का भाव जगाया, लेकिन इससे आगे कुछ और नहीं हो पाया. एक म्यूजीशियन की हैसियत से जगजीत सिंह मेरे दोनों स्थापित गजल गायकों से बड़े लगते थे मगर गायकी के खयाल से हमारे दोनों उस्तादों का जवाब नहीं था. जगजीत सिंह की कैसेट वर्षों मैं इसलिये नहीं खरीद पाया क्योंकि उनकी असाधारण आवाज के साथ उनकी पत्नी चित्रा सिंह की आवाज का चिपका होना मुझे पसन्द नहीं था. कैसेट की दुकान पर मैं उनकी ऐसी चीज तलाशता जिसमें चित्रा सिंह का योगदान न हो.
मैं अपने पसन्दीदा गायकी को सिर्फ सुनने का दीवाना नहीं था. औरों को सुनाना भी मुझे काफी पसन्द था. कभी-कभी तो मैं अपने पास वाले को इतनी तवज्जो के साथ सुनाने की कोशिश करता कि मुझे पता ही नहीं चलता कि सामनेवाले के साथ ज्यादती भी कर रहा हूँ. शुक्र ये रहा कभी किसी ने भुझे मेरी इस हरकत के लिये वैसा रिऐक्सन नहीं दिया जो एक बुरी याद बन मेरे मन में बैठ जाये. इस प्रकार मैनें गुलाम अली और मेहँदी हसन के कई पक्के चाहनेवाले बनाये. कई खूबरूवों को वो हसीन सुरों के पैमाने पेश करते हुये मैंनें अपनी छुपी हुई अहसासों को उन तक पहुँचाने में कामयाबी पायी. औरों को सुनाने में जो मजा मिलता था वो खूबसूरत यादें बन गयीं. आज भी उन गजलों गीतों को सुनने पर वो हसीन लम्हा आस-पास चलकदमी करने लगती हैं. वक़्त बीतने के साथ समझ बदलना लाजिम है. जिनके बारे बेमेयारी होने का खयाल था उन्हें फिर से सुनने की जहमत उठाया तो पाया कि जनसाधारण के बीच वाहवाही लूटनेवाले गायकों में ऐसा बहुत किछ था जिसे हम न सुनकर अच्छा नहीं कर रहे थे. पंकज उधास जैसे गायकों के बारे में अपने कुछ चाहने वालों से जब प्रशंसा सुनी तो मैने उन खूबियों की ओर ध्यान दिया जिसे हम अपने उस्तादों के मेयार के आगे देखने से ही इंकार करते थे. एक शाम जब पापा ने पंकज उधास की ‘कभी-कभी तेरे मैखाने....’ की प्रशंसा में विभोर हो गये तो मैने उस गजल को गौर से सुना और उसकी खूबसूरत गायकी का कायल हो गया. मैच्योरिटी का एक नया आयाम मेरे मन से जुड- गया. साथ ही, वो पुराने गीत जिन्हें मैं सड़क किनारे बजते सुनता था, धीरे-धीरे अच्छे लगने लगे. क्योँ?-- देर से पता चला कि उन गजलों के साथ जिन लोगों की यादें मेरे मन से जुड़ी थीं वो हमसे बिछड़ चुके थे. उन यादों में एक महत्वपूर्ण कड़ी बनकर वो गाने मन के बैकग्राउंड में बज रहे थे. यह भी था कि गम्भीर गजलें सुनते-सुनते हल्की-फुल्की सुपाच्य धुन कान को अच्छे लगने लगे थे. मेरे मन का गम्भीर स्रोता अब सहजता की तलाश में था. शास्त्रियता से अलग हटकर सहजता की तलाश एक अलग तरह की सुहानेपन का अहसास था.
वक़्त बीतता रहा, मैं इश्क़ करता रहा, गजल सुनता रहा, कहता रहा, और वक़्त सचमुच बीतता रहा. गजलों, गीतों, नग्मों के वो कैसेट्स जिन्हें खरीदते समय उससे बिछड़ने की बात जेह्न में आई ही न थी, आज कहीं दूर धूल और मकड़ी के आगोश में चुपचाप पड़ी होंगी. सोचता था किसी रोज उन्हें फिर से जगाकर उनके सुर ताल से मन को पुरानी अहसासों में रंगुँगा. ऐसे ही और भी वक़्त बीत गया. अचानक, एक दिन एक लड़के ने www.dishant.com की चर्चा की, बताया वहाँ सारी पुरानी गीतों का जखीरा उपलब्ध है. अगली नेट ब्राउजिंग पर ही मैनें इस वेब्साइट को विजिट किया. सचमुच, अद्भुत संग्रह है. मेहदी हसन, गुलाम अली, बेगम अख्तर, जगजीत सिंह के साथ साथ सभी बड़े नामों की गजलें उपलब्ध हैं. एक के बाद दूसरे तीसरे गायकों को सुनते हुए ऐसा लग रहा था कि जिन गजलों को सुनकर मन मस्ती के सागर में गोता लगाने लगता था, अब बड़ा फीका-फीका लग रहा है. शब्द वही हैं, उसके मानी भी वही, वही बेहतरीन कम्पोजीशन, फिर भी उनसे जुड़ा जादु जाने खो सा गया है. उन पूराने गजलों को अब सुनने पर वो कुँवारा फीलिंग नहीं उभर रहा. वो सारे गीत इतने उदास क्यों हो गये?
जाहिर है, इन गीतों गजलों के इर्द गीर्द जो एक माहौल था, जो लोग थे, जो हमारे साथ उन्हे सुनते हुए मेरे आनन्द को रेजोनेट करते थे, वो सब हमसे दूर हो गये हैं. माहौल बदल गया, तो इन गीतों के हमसे जुड़े मानी भी बदल गये. कोशिश करके देखा तो उन बीते लम्हों को याद करते हुए सुनने में ज्यादा सुकून मिला. ऐसा लगा कोई पास बैठकर मेरे साथ साथ सुन रहा है. बन्द आँखों में माजी के खयालों में उतराते उन गीतों को सुनना एक अलग तरह का सुकून लगा. लेकिन फिर खुली आँखों में जो आज है उसमें वे पुराने गीत बड़ी फीके लगते है.इसमें www.dishant.com का कोई कसूर नहीं, इस वेब्साईट का काम गीत और गजले उपलब्ध कराना है, न की ‘असर’ तलाश करना.
