Saturday, February 28, 2009

मैं बिहार हूँ

मैं बिहार हूँ

विहारों के आंगन में
जन्मा मैं
बहारों ने सींचा मुझे
मैं अल्हर जवानी
बेकरार हूँ
मैं बिहार हूँ

मैं हूँ
भारत का वो सुनहला अद्ध्याय
बिखरे हैं पन्ने जिसके
गंगा के निर्जन
तट पर
मैं नदी की
चमकती धार पर
सोया हुआ पतवार हूँ
मैं बिहार हूँ

बहके हुए कदमों का
दिशाहीन मैं राही
सपनों में खोए हुए
पलकों का मैं सायी
बस, यूँ ही भटका सा
एक सहर्षहार हूँ
मैं बिहार हूँ

थककर मैं सोता नहीं
दिल्ली-कलकत्ते की
उष्ण-प्रखर सड़कों पे,
मुम्बई की रेलों पे दौड़ती
इस्पाती विकराल पे
दुबका मैं कोने में
चिपका श्रमसार हूं
मैं बिहार हूँ

Toward the end of 2008

Saturday, February 14, 2009

वसंत
हवा में में घुली हुई
यादों की महक
मानो फैल रही है,
धूप को आगोश में लिये
वसंत आवारा
टहलने लगा
घर के दरवाजे पर
झाँकने लगा लुक-छिप
खिड़कियों से अन्दर
रजाई में दुबके
सोये हुए अहसासों को ।

बदलेपन के ऐसे मोड़ प
तुम पास चले आते हो
परायेपन का बन्धन तोड़कर
वसंत के हल्के आहट में
महकती साँसों को
छुपाये हुए
झूठे एकाकीपन की
नर्माहटों में ।

20-01-2009, सुबह 10.20