मैं बिहार हूँ
मैं बिहार हूँ
विहारों के आंगन में
जन्मा मैं
बहारों ने सींचा मुझे
मैं अल्हर जवानी
बेकरार हूँ
मैं बिहार हूँ
मैं हूँ
भारत का वो सुनहला अद्ध्याय
बिखरे हैं पन्ने जिसके
गंगा के निर्जन
तट पर
मैं नदी की
चमकती धार पर
सोया हुआ पतवार हूँ
मैं बिहार हूँ
बहके हुए कदमों का
दिशाहीन मैं राही
सपनों में खोए हुए
पलकों का मैं सायी
बस, यूँ ही भटका सा
एक सहर्षहार हूँ
मैं बिहार हूँ
थककर मैं सोता नहीं
दिल्ली-कलकत्ते की
उष्ण-प्रखर सड़कों पे,
मुम्बई की रेलों पे दौड़ती
इस्पाती विकराल पे
दुबका मैं कोने में
चिपका श्रमसार हूं
मैं बिहार हूँ
Toward the end of 2008
Saturday, February 28, 2009
Saturday, February 14, 2009
वसंत
हवा में में घुली हुई
यादों की महक
मानो फैल रही है,
धूप को आगोश में लिये
वसंत आवारा
टहलने लगा
घर के दरवाजे पर
झाँकने लगा लुक-छिप
खिड़कियों से अन्दर
रजाई में दुबके
सोये हुए अहसासों को ।
बदलेपन के ऐसे मोड़ प
तुम पास चले आते हो
परायेपन का बन्धन तोड़कर
वसंत के हल्के आहट में
महकती साँसों को
छुपाये हुए
झूठे एकाकीपन की
नर्माहटों में ।
20-01-2009, सुबह 10.20
हवा में में घुली हुई
यादों की महक
मानो फैल रही है,
धूप को आगोश में लिये
वसंत आवारा
टहलने लगा
घर के दरवाजे पर
झाँकने लगा लुक-छिप
खिड़कियों से अन्दर
रजाई में दुबके
सोये हुए अहसासों को ।
बदलेपन के ऐसे मोड़ प
तुम पास चले आते हो
परायेपन का बन्धन तोड़कर
वसंत के हल्के आहट में
महकती साँसों को
छुपाये हुए
झूठे एकाकीपन की
नर्माहटों में ।
20-01-2009, सुबह 10.20
Subscribe to:
Comments (Atom)
