मैनें कहा ' इज्म कोई भी हो, सिस्टम की सफलता के लिये उसके पार्ट्स को पूरी इमानदारी और एफिसिएंसी के साथ काम करना पड़ेगा; कुशलता और ईमानदारी सफलता के लिये एक आवश्यकता नहीं बल्की मजबूरी हैं. आप सफल होना चाहते हैं तो कुशलता और ईमानदारी के सिवा और कोई रास्ता नहीं. अब प्रश्न है कि कुशलता और ईमानदारी की शर्त कैसे पूरी हो? एक पुंजिवादी व्यवस्था में व्यक्तिगत निर्णय और प्रयास की स्वतंत्रता होती है जिसकए एवज में मनुष्य को व्यक्तिगत लाभ की उम्मीद होती है, हानि का दायित्व भी उसी व्यक्ति का होता है. हानि के लिये तैय्यार व्यक्ति लाभ पाने कि उम्मीद में अनथक प्रयास करता है. यहाँ व्यक्ति को कुशलता प्राप्ति के प्रति प्रेरित करनेवाला कारण मनुष्य में प्राकृतिक रूप से पाया जानेवाला गुण 'स्वार्थ' होता है. इसी के वषीभूत इंसान हर अच्छा-बुरा कर्म करता है. सामाजिक संस्थाओं की सीमाओं के अन्दर मनुष्य ने आरम्भ से ही अपनी आदिम पाशविक प्रवृत्तियों को पालतू बनाकर उसे रचनात्मक रूप देने में सफल्ता पाई है. इन्हीं प्रवृत्तियों की प्रेरणा से सारा मानवीय सभ्यता का विकास हुआ है. इन्हीं आदिम प्रवृत्तियों में एक, 'स्वार्थ' के कारण मनुष्य हर प्रकार का प्रयास करता है. इसमें दूसरी प्रवृति जो महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है वह है आपसी प्रतिद्वन्द्विता. यह प्रवृत्ति मानवीय कृयाशीलता को बढावा देता है. इस प्रकार मनुष्य की व्य्क्तिगत प्रयास और ऐसे प्रयासों के बीच प्रतिद्वन्द्विता उस कुशलता को जन्म देती है जिसका होना मानवीय संस्थाओं की सफलता के लिये लाजिमी है. एक पूँजीवादी व्यवस्था में व्य्क्तिगत प्रयासों एवं उनके बीच प्रतिद्वन्द्विता को महत्व देते हुए सामाजिक आर्थिक एवं सांस्कृतिक व्यवस्था की परिकल्पना की जाती है. दूसरी बात है ईमान्दारी की. ईमान्दारी एक स्वाभाविक प्रवित्ति नही है. इसे मनुष्य ने अपनी संस्थाओं को अधिक मानवीय बनाने के लिए ईजाद किया है. विभिन्न मानवीय प्रयासों के बीच समण्वय, व्यवस्थिति एवं अधिकतम लाभकारी बनाने में ईमानदारी जैसे मानवीय यंत्र का कोई दूसरा पर्याय नहीं है. बहुविध मानवीय प्रयासों की उच्चतम उपलब्धि के लिये भी ईमान्दारी जरूरी है. तो हमने देखा कि मानवीय प्रयासों की उपलब्धी की उच्चता के लिये जो ईमानदारी और कुशलता लाजिमी है, उसे प्राप्त करने के लिये मानवीय प्रकृति का ही सहारा लेना पड़ता है.
अब हम एक अन्य पहलू की तरफ ध्यान दें. देखें कि क्या कोई और भी रास्ता है जिसके द्वारा किसी व्यवस्था को सफतापूर्वक चलाया जा सकता है. एक रास्ता है, और वह है सिस्टम को नियंत्रित तरीके से व्यवस्थित करने का. इसके द्वारा किसी एक समूह के द्वारा अन्य समूह की तमाम गतिविधियों का संचालन किया जाना. ऐसा ही मानवीय इतिहास के विभिन्न युगों में होता रहा है. लेकिन आधुनिक युग के साथ इस स्थिति में परिवर्तन देखा गया जब व्यक्ति की अपनी गरीमा ने सामुहिकता के उपर वर्चस्व स्थापित करना प्रारम्भ किया. मनुष्य की पहली पहचान एक व्यक्ति के रूप में होने की बात युरोप में रेनेसाँ के प्रमुख लक्षणों के रूप में किया जाता है. आज का मनुष्य आवश्यक रूप से पहले एक व्यक्ति है फिर समष्टि का भाग. उसे एक व्य्क्तित्व के रूप में सोचने, जीने, व्यवहार करने, आदि की पर्याप्त छूट समाज द्वारा प्रप्त है. स्वयं समाज ने मनुष्य के व्यक्तिगत इयत्ता को काफि सशक्त तरीके से मान्यता दी है. ऐसे में किसी एक समुह द्वारा अन्य के उपर शासन की अवधारणा आज व्यवहारिक स्तर पर काफी सिमित हो हो गया है. गणतांत्रिक पद्धति की शासन प्रणाली में शासक और शासित का फर्क किसी सिद्धांत का हिस्सा नहीं बल्कि एक व्यवहारिक पहलू मात्र है. ऐसे में एक सफल सामाजार्थिक व्यवस्था की सफलता के लिये एक केन्द्रियकृत नियंत्रित उपाय की स्वीकार्यता सम्भव नहीं लगता. इस प्रकार कि नियंत्रित शासन प्रणाली के जो रूप हमारे सामने उपस्थित हैं उनमें से एक समाजवादि व्यवस्था की असफलता के पीछे एक कारण इस परिप्रेक्ष्य से भी जुड़ा हुआ है. यहाँ समाजवाद के खिलाफ इस तर्क का यह मतलब कदापि नहीं लगाया जा सकता कि हम पूँजीवाद को एक उत्तम व्यवस्था के रूप में रेखांकित कर रहे हैं. यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि आज का मनुष्य 'नियंत्रण' की अवधारणा से घबड़ा जाता है. पिछले 100 वर्षों के समाजवादी अनुभव ने एक ओर जहाँ कई तरह की सफलताएं अर्जित की तो दूसरी तरफ हम इसकी असफ्लताओं से निगाहें नहीं चुरा सकते. जिन देशों में समाजवादी सिद्धांतों के आधार पर शासन व्यवस्था कायम हुई, चलीं वहाँ यकायक ऐसा क्या हुआ कि लोगों में इसके प्रति आक्रोश भरक उठी. आज किसी भी पुरानी व्यवस्थावाले देश में समाजवादी तरीके सरकारों को जन समर्थन नहीं मिल रहा. समाजवाद मूलतः मानवीय अतिविधियों को नियंत्रित करने की अवधारणा पर आधारित व्यवस्था है. और यह नियंत्रण किस हद तक होनी चाहिये, इसका कोई सुनिशित सीमा रेखा निर्धारित नहीं. इस नियंत्रणात्मक प्रवृत्ति ने समाजवादी देशों में अमानवीय हदों तक पहुँचनेवाली सरकारों को भी जन्म दिया, जिसके ऊपर किसी प्रकार का नियंत्रण नहीं देखा गया. एक उदारवादी लोकतांत्रिक समाज में ऐसी सरकारों के उपर किसी न किसी प्रकार का एक नियंत्रण देखा गया है जिसने निरंकुशता का विनाश करता है. इसके अलावा, उदारवादी लोकतंत्र एक स्वतः नियंत्रित, स्वतः विकसित होती हुई व्यस्था के रूप में सही साबित हुई है. इसके साथ ही यह ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस व्यवस्था से जुड़ी समस्याओं का निराकरण इसके अन्दर ही सम्भव हैं. भारत जैसा बहुविध, बहुजातिक, बहुभाषिक देश अपनी उदारवादी लोकतंत्र की सफलताओं के साथ बड़ी-बड़ी सामाजिक समस्याओं से जूझने में समर्थ हो पाया है. कितने ही विकासशील देश तरह-तरह की अलोकतांत्रिक यात्राओं के बाद इसी ओर अग्रसर हुए हैं. ऐसे सभी देशों में उदारवादी लोकतंत्र की ज़ड़ें जमती दिख रही हैं. इसके पीछे मनुष्य की स्वतंत्र रहने की प्रवृत्ति काम करती हैं.
Friday, April 3, 2009
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